बजट में घुमक्कड़ी के साथ घर जैसा एहसास देते हैं ‘होमस्टे’

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नई दिल्ली (अंशु सिंह): लाहौल स्फीति के आखिरी गांव मूढ़ में कुछ वर्ष पहले तक ठहरने का इंतजाम नहीं रहने के कारण सैलानी शाम ढलने से पहले ही वापस लौट जाते थे। लेकिन आज तारा ने अपने घर के दरवाजे इनके लिए खोल दिए हैं। यात्रियों को होमस्टे का विकल्प मिल गया है। कुछ वैसे ही जैसे, लद्दाख की सबसे प्रसिद्ध झील पैंगॉन्ग देखने आने वाले पर्यटकों के लिए झील के समीप स्थानीय ग्रामीणों ने होमस्टे शुरू कर दिए हैं। डोलकर उनमें से एक हैं। उनके पति सेना में हैं। वे अपने बच्चों के साथ गांव में रहती हैं। कुछ साल पहले तक संपर्क एवं संचार का कोई माध्यम नहीं था। पर्चियों के माध्यम से उन तक सूचना पहुंचती थी कि अमुक पर्यटक ठहरने के लिए आ रहे हैं। अब दूसरे साधनों से उनसे संपर्क किया जाता है। डोलमा ने बताया कि लेह से यहां की सीधी बसें चलती हैं। होमस्टे शुरू होने से उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया है। बच्चे पढ़ रहे हैं। और क्या चाहिए? जानकारी के अनुसार,आज स्फीति घाटी के सभी छह गांवों (डेमुल, लांग्जा, दनकार, किब्बर, लालुंग, कोमिक) में कई होमस्टे खुल गए हैं।

जम्मू-कश्मीर में हिमालय की गोद में बसी स्फीति घाटी की यात्रा कहीं से आसान नहीं, लेकिन रोमांच पसंद हर मुसाफिर को यह लुभाती है। विशेषकर ट्रेकर्स यहां खिंचे चले आते हैं। वहीं, एकांत की तलाश में भी दूर-दूर से यात्री यहां आते हैं। सोलो ट्रैवलर शुभांगी को भी लद्दाख का बर्फीला रेगिस्तान आकर्षित करता है। वह बताती हैं, ‘मैं काफी यात्राएं करती हूं। कई बार सुदूर, अनजाने इलाकों में जाना होता है, जहां होटल वगैरह नहीं होते। ऐसी स्थिति में होमस्टे में ठहरना सुरक्षित और सुकून भरा होता है। जैसे, मुनसियारी के एक होमस्टे का किस्सा याद आता है। मेरी होस्ट सोनम एक घरेलू महिला थीं। गांव से ज्यादा बाहर निकलना नहीं हुआ था। लेकिन उनके पास कहानियों का खजाना था, जो शायद किसी टूरिस्ट गाइड के पास भी न हो। सबसे बड़ी बात यह कि वह लाजवाब व्यंजन बनाती थीं। उनके हाथ में जादू था। दरअसल, होमस्टे की विशेषता होती है कि आपको वहां घर का बना भोजन मिलता है। आप खुद से भी रसोई में पसंद का भोजन बना सकते हैं या स्थानीय पाक कला सीख सकते हैं।

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