कलंक : फिल्म समीक्षा

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पवन कुमार रस्तोगी

करण जौहर के पिता यश जौहर को वर्षों पहले ‘कलंक’ बनाने का आइडिया आया था। उनकी मृत्यु के वर्षों बाद करण ने यह फिल्म बनाई है जो आज के दौर में ‘मिसफिट’ लगती है। फिल्म में भव्यता है। कलाकारों की भीड़ है, लेकिन इसके बूते पर ही फिल्म अच्छी नहीं बनती। फिल्म के दो पात्र कहते हैं कि जब जिंदगी दु:खों से भर जाए तो जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना चाहिए ताकि हल्कापन महसूस हो, काश फिल्म देखते समय भी इस तरह की इजाजत होती तो कई दर्शक सिनेमाहॉल में ही यह काम करना चाहते।

लाहौर के पास हुस्नाबाद की कहानी है। वक्त है 1946। सत्या (सोनाक्षी सिन्हा) को डॉक्टर्स ने कह दिया है उसके पास केवल एक साल का समय है। वह अपने पति देव (आदित्य रॉय कपूर) की शादी रूप (आलिया भट्ट) से करा देती है। रूप इसलिए तैयार हो जाती है क्योंकि उसके परिवार पर सत्या के कई एहसान हैं साथ ही उसकी दो छोटी बहनें भी हैं जिनकी उस पर जिम्मेदारी है। देव और रूप की शादी महज एक समझौता है।

देव और उसके पिता बलराज चौधरी (संजय दत्त) एक अखबार चलाते हैं और इस अखबार से कुछ स्थानीय लोग नाराज हैं क्योंकि इसमें मशीन के पक्ष में लेख छपते हैं जिससे लोहारों के काम को खतरा पैदा हो गया है।बलराज के कभी बहार बेगम (माधुरी दीक्षित) से संबंध थे। उनकी नाजायज औलाद ज़फर (वरुण धवन) है जिससे रूप मोहब्बत कर बैठती है। ज़फर के दिल में नफरत भरी हुई है क्योंकि मां ने उसे फेंक दिया और पिता ने कभी उसे नाम नहीं दिया। बहार बेगम बदनाम बस्ती हीरा मंडी में रहती है और रूप उससे संगीत सिखती है। प्यार और नफरत के इस खेल में रिश्तों के समीकरण उलझ जाते हैं।
कहानी की बुनियाद ही इतनी कमजोर है कि उस पर लिखा स्क्रीनप्ले विश्वसनीय ही नहीं बन पाया है। सत्या क्यों अपने सामने अपने पति की दूसरी शादी कराना चाहती है? कोई ठोस वजह नहीं दी गई। देव बार-बार बोलता है कि वह सत्या को बेहद चाहता है, लेकिन यह बात कभी भी फिल्म में झलकती नहीं। सवाल तो यह है कि देव पत्नी को इतना चाहता है तो दूसरी शादी के लिए क्यों राजी हो जाता है?

रूप के परिवार पर सत्या ने क्या अहसान किए हैं इसका कोई जवाब नहीं है। देव शहर का नामी व्यक्ति है, लेकिन ज़फर उससे जानता तक नहीं है। रूप हीरा मंडी जैसी बदनाम बस्ती में खुलेआम ज़फर के साथ घूमती है, लेकिन उसके घर तक यह बात नहीं पहुंचती। ज़फर और रूप अचानक इश्क करने लग जाते हैं और इसके लिए कोई सिचुएशन ही नहीं बनाई गई।

देव के अखबार में छपने वाले एक लेख से लोहार इतना क्यों घबरा जाते हैं कि शहर जला देते हैं समझ से परे है। ऐसी कई बातें और प्रश्न हैं जो आपको फिल्म देखते समय परेशान करते रहते हैं और जिनका जवाब नहीं मिलता।

अभिषेक वर्मन निर्देशक के रूप में निराश करते हैं। बड़े सेट और बड़ी स्टारकास्ट से वे दर्शकों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं। फिल्म की जरूरत से ज्यादा भव्यता फिल्म को ही नुकसान पहुंचाती है। बहार बेगम कोठी इस तरह से सजाई गई है मानो वे कहीं की रानी-महारानी हैं, जबकि वह एक तवायफ है।

अभिषेक ने फिल्म में भावनाओं का ज्वार उठाने की कोशिश की है, लेकिन कमजोर कहानी के चलते ऐसा नहीं हो पाया। ज़फर और रूप की मोहब्बत बिलकुल भी दर्शकों के दिल को नहीं छूती। उनका प्यार बेहद सतही लगता है। ज़फर का बुल फाइट वाला सीन स्क्रिप्ट में बिलकुल फिट नहीं बैठता। अभिषेक ने दृश्य इतने लंबे रखे हैं कि कोफ्त होने लगती है। यही हाल फिल्म का भी है। कहानी में इतना दम ही नहीं है कि इसे 168 मिनट तक खींचा जा सके। ‘इस गूफ्तगू से हम थक गए’, यह बात आलिया को माधुरी कहती है और दर्शकों पर भी थकान का असर होने लगता है।

वरुण धवन का अभिनय अच्छा है। उन्होंने भावनाओं को त्रीवता के साथ पेश किया है, लेकिन उन्हें हिंदी का उच्चारण सुधारने की जरूरत है। आलिया भट्ट ने अपनी ओर से शत-प्रतिशत दिया है, लेकिन स्क्रिप्ट का उन्हें साथ नहीं मिला। आदित्य रॉय कपूर को बढ़िया ड्रेसेस पहनना थी और कुछ संवाद बोलने थे जो उनके लिए आसान काम था।

सोनाक्षी सिन्हा को बहुत कम स्क्रीन टाइम मिला और उनका रोल महत्वहीन है। संजय दत्त तो फिल्म में दर्शक की तरह दिखाई दिए। माधुरी दीक्षित का किरदार बेहद नकली है और इसका असर माधुरी के अभिनय पर भी पड़ा। कुणाल खेमू असर छोड़ते हैं। कृति सेनॉन का गाना फास्ट फॉरवर्ड करने लायक है।

फिल्म में गीतों की अधिकता है। ‘फर्स्ट क्लास’ गाना फिल्म के सेटअप में मिसफिट है। इसके बोल और डांस आज के दौर के लगते हैं। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी उम्दा है। सेट पर काफी पैसा खर्च किया गया है। एडिटिंग ऐसी है मानो एडिटिंग करने वाला ही सो गया हो।

फिल्म में एक गाना है ‘तबाह हो गए’ और यही बात दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलते समय सोचता है।

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