सीएम और डीएम के प्रयास के दावे के बाद भी लुप्त हो रहि सरस्वती की सातवीं धारा सूख रहि मनोरमा कैसे बहेगी नदी की परवाह प्रशासन मौन

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देखिए कैसे लुप्त हो रही है मनोरमा नदी की तस्वीर

विकास पाण्डेय

त्रेताकाल की यह नदी मखौड़ा धाम में मैदान का रूप ले चुकी है मनोरमापुराणों वा महाभारत में वर्णित यह नदी गिन रही अंतिम सांसे नहीं रहा किसी का ध्यान।शासन के दावे खोखले साबित हुए।कहां 3 महीने में ही मनोरमा को अविरल धारा के रूप में पुनः स्थापित करने की बात प्रदेश के मुख्यमंत्री ने हजारों की संख्या में मौजूद जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था।पर मैदानी रूप ले चुकी मनवर नदी की दुर्दशा पूरे प्रशासनिक अमले को मुंह चिढ़ा रही है।मनवर को आस्थावान मां बुलाते हैं वह मां जिसके आंचमन मात्र से ही मन के पाप हर लें।पर मनवर की जीर्ण-शीर्ण दशा इसके अस्तित्व के संकट की बानगी है।युगों से कल कल बहती धारा विलुप्त हो गयी है।जिसके किनारे त्रेतायुग में चक्रवर्ती महराज दशरथ ने यज्ञ किया था तो द्वापर में कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम ने प्रवास के दौरान सरस्वती रूप में पूजा।वर्तमान में मनोरमा की पीड़ा है कि भगीरथ बनने के दावे के साथ मेरी धारा में चुनावी नैया भी पार लगाने में नही चूके।पर अब जब मैं सूख रही तो मेरे उद्धार के लिए भगीरथ प्रयास तो किया पर न तो मेरी धारा अविरल हुई और ना ही मेरा उद्धार हुआ।14 अगस्त सन 2018 को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर्रैया तहसील के कसैला गांव में मनोरमा नदी के तट पर स्थित तपसी धाम मंदिर पर तीन दिवसीय यज्ञ कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे थे।और सबसे पहले उन्होंने वही कहा था कि रामराज्य की परिकल्पना की पहली भूमि मखक्षेत्र मखौड़ाधाम ही है जहां पुत्रकामेष्ठी यज्ञ के बाद श्रीराम सहित चारो भाइयो का जन्म हुआ था।

नदी का पौराणिक महत्त्व

इस नदी के पर तट परशुरामपुर विकास खंड में मखौड़ा धाम (मख भूमि) स्थित है। जहां त्रेता युग में राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था। चार पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी। त्रेता युग की मनोरमा विलुप्त होने कगार पर है। अवध क्षेत्र की यह वही नदी हैं जो बस्ती और गोंडा जनपद को कभी जोड़ती थी। महाभारत के शल्य पर्व में इसे सरस्वती नदी की सातवीं धारा कहा गया है।अब आकर प्रकार और श्रंगार सब गया है। कहि नदी के गभ में रास्ता बना लिया गया है तो कहीं किनारे पर घर बन लिया गया है। जिले में 30 से 40 किमी लंबाई वाले इस नदी का सदानीर गायब है। पौराणिक पहचान अभी भी शेष ही हैं। मगर नदी की भौतिक स्थित काफी बिगड़ चुकीं है। त्रेता युग में ऋषि उछालक द्वरा यज्ञ करके सरस्वती नदी को मनोरमा के रूप में प्रकट किया गया था। यह बस्ती जनपद के लालगंज में आकर कुआनो नदी में समाहित हुई। नदी में पानी का प्रवाह कम हुआ तो स्थानीय लोग इस पौराणिक विरासत के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दिया। नदी की जमीन पर मकान निर्माण, खेती आदि कार्य होने लगे हैं। जिससे इस नदी का अस्तित्व समाप्त होने को हैं। द्वापर युग में महाभारत मे भी इस नदी का वर्णन मिलता है जहाॅ महाभारत के शल्य पर्व के 38 वे अध्याय में सरस्वती नदी की सात धराओ का उल्लेख सुप्रभा,काचंनाक्षिक विशाला, मनोरमा, सरस्वती,आंघवत,सुरेणु और विमलोदका नाम से किया गया है।इस अध्याय में यह उल्लेख है कि भगवान श्री कृष्ण के भाई बलराम सत्प , तीर्थ यात्रा के दौरान इस नदी के तट पर आए थे उछालक ऋषि के पुत्र नचिकेता ने ऋषियो व मनीषियों को नासिकेत पुराण सुनाया था नासिकेत पुराण में मनोरमा के महात्म्य का वर्णन किया गया है कहां गया है कि अन्य क्षेत्रे कृतं पापं काशी क्षेत्रे विनश्यति,
काशी क्षेत्रे कृतं पापं प्रयाग तीथें विनश्यति,
प्रयाग तीथें कृतं पापं मनोरमायां विनश्यति ,
मनोरमायां कृतं पापं वजलेपो भविष्यति।।
अर्थात अन्य क्षेत्र में किया गया पापं काशी में स्नान करने से नष्ट होता हैं ।काशी में किया गया पापं प्रयाग में और प्रयाग में किया गया पापं मनोरमा में स्नान करने से नष्ट हो जाता हैं।लेकिन मनोरमा तीथें में किया गया पापं बजलेप के सामन होता है।अर्थात वह घातक होता है।

नदी का वर्तमान दशा

सरस्वती नदी तो अपने वास्तविक स्वरूप को खो कर विलुप्त हो चुकी है लेकिन पाप नाशिनी मनोरमा अभी भी अपने आस्तिक को लेकर अंतिम सांस ले रही हैं नदी का प्रवाह कहीं-कहीं खत्म हो चुका है मनोरमा टुकड़ों में बांटकर तालाब का रूप लेने लगी हैं सिल्ट काई तथा और मिट्टी से मनोरमा पट चुकी है जलस्तर घट गया है कुछ छिछले भाग हैं जहां थोड़ा बहुत पानी दिखाई देता है बरसात के दिनों में भी या नदी सुखी ही नजर आती है। सरकार मखौड़ा धाम तथा मनवर नदी का विकास कर इसे विश्व मानचित्र पर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करेगी।उनके इस आश्वासन के बाद बस्ती के डीएम डॉ राजशेखर ने नवम्बर माह में ही अपने मातहतों एवं पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ मनोरमा नदी का स्थलीय सर्वे कराया एवं रिपोर्ट मुख्यमंत्री को संदर्भित कर शासन को सौंपा।इसके बाद सीएम दोबारा 28 जनवरी 2019 को एक विशाल जनसभा को संबोधित करने मखौड़ाधाम में आए और साथ ही नदी की सफाई के अभियान का शुभारंभ किया था।तकरीबन 4 माह बीत गया छिटपुट जगहो को छोड़कर कहीं कोई ऐसा कार्य नहीं हुआ जिससे नदी की प्रवाह में कोई अंतर आए है।साथ ही उन्होंने बस्ती की प्रशासनिक मशीनरी को नसीहत के साथ निर्देश दिया था कि 3 महीने के अंदर करीब 115 किलोमीटर में बह रही मनोरमा की धारा को अविरल बनाने का काम युद्ध स्तर पर किया जाये।इसके लिए नदी की साफ सफाई एवं उनके जलस्तर को बढ़ाने के लिए चरणबद्ध तरीके से कार्यक्रम सुनिश्चित करें 3 महीने के भीतर मुझे रिपोर्ट सौंपी जाए।पर यह फरमान बेअसर रहा मनोरमा में साफ सफाई की बात तो दूर जिले में नदी ही सूख गयी।जबकि यह अपने उद्गम स्थल टिकरी से अभी भी अविरल धारा के रूप में कल कल बह रही है और अंतिम छोर लालगंज तक भी इसका जलस्तर स्नान एवं आसमान के लायक दिखता है पर बीच में नदी के मैदानी रूप लेने के चलते पानी का ठहराव नही है और नदी की सतह चटक कर मैदानी रूप ले चुकी है।

चुनाव बना अड़ंगा

115 किमी दायरे में बह रही मनोरमा नदी बस्ती में पिछले तीन दशकों से धीरे-धीरे सूख रही है इसके कायाकल्प के लिए पब्लिक कैंपेन चलाकर परियोजना को गति दी गयी।
करीब 10 हजार लोगो ने तीन महीने तक अपना श्रमदान का आश्वासन दिया।प्रसाशन द्वारा स्कूल, कॉलेज और एनजीओ से संपर्क किया जा चुका है। इसके अलावा नदी के पास बसे 97 ग्रामसभा के 56 हजार परिवारों को मनरेगा के तहत 17 लाख मानव दिवस सृजित कर नदी को अविरल बनाने का ब्लूप्रिंट जिलाधिकारी डॉ राजशेखर ने बनाया था काम भी शुरू हुआ पर अंदर खाने से चर्चा है कि चुनावी राग में तंत्र ढीला पड़ गया।

इसके पश्चात कई विधायकों एवं सांसदों ने इस अभियान से अपने आप को जोड़ा भी मगर इस मामले में सिर्फ फोटो खिंचवाने और मीडिया पर हाईलाइट होने तक ही सीमित रह गया।

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