सत्ता का मार्ग भरत चरित्र से हो तो रामराज्य ही होगा-साध्वी राधिका किशोरी

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परशुरामपुर से निखिल पाण्डेय की रिपोर्ट

मखौड़ाधाम में चल रही सप्तदिवसीय श्रीराम कथा के छठे दिन कथा में कथा व्यास ने भरत मिलाप की कथा सुनाईं ।कथा के माध्यम से उन्होंने भातृ प्रेम व सत्ता के प्रति समर्पण को बड़े ही रोचक ढंग से भरत प्रसंग से समझाया।अयोध्या का राज सिंहासन पाने के बाद भरत ने जिस तरह सत्ता के प्रति अमोह व्यक्त किया और जीवन का सच्चा सुख बड़े भाई के सानिध्य में ही बताया इससे प्रेम त्याग और समर्पण की पराकाष्ठा सिद्ध होती है।जब राम का बनवास हुआ तो भरत भाई शत्रुघ्न के साथ ननिहाल में थे पिता की मृत्यु का समाचार सुनने को मिलता है तो उनके ऊपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। पहला जीवन के अंतिम क्षणों में पिता की सेवा से वंचित रह जाना दूसरे जिन भाई के संरक्षण में अपार सुख की कामना रही वह वन चले गए और तीसरा राम के राज्याभिषेक के बजाय उनका राज्याभिषेक जिससे प्रजा का असंतोष परंतु इसके बावजूद भी भरत ने धैर्य नहीं छोड़ा और मंत्री सुमंत के साथ भाई से मिलने चित्रकूट की तरफ चल पड़े इतना सुनते ही तीनों माताएं तथा प्रजा जन गुरुजन भी उनके साथ चल पड़े। चित्रकूट की सीमा में पहुंचने से पहले जब लक्ष्मण को यह होता है कि भारत अयोध्या वासियों के साथ आ रहे हैं तो उनके मन में डर व्याप्त होता है और अस्त्र उठाकर भाई राम से कहते हैं कि भरत को अयोध्या के राज्य से भी मन नहीं भरा और वह चढ़ाई करने आ रहें है परंतु श्री राम को भरत के हृदय प्रेम पर पूरा विश्वास है लक्ष्मण को समझाते हैं भाई भरत ऐसा नहीं हो सकता। राम और भरत का मिलाप होता है और इस घड़ी दोनों में अपार प्रेम वर्णन कथा व्यास ने बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया।जब राम को पिता दशरथ की मृत्यु की सूचना मिलती है तो वह भी दुःख के सागर में डूब जाते हैं और भरत को यह समझाते हैं कि ऐसी परिस्थिति में राज्य सिंहासन का खाली होना ठीक नहीं है भाई भरत वापस चले जाओ और अयोध्या का राज्य संभाल लो पर भरत कहते हैं कि मेरा सारा सुख और ऐश्वर्य वैभव सब आपके चरणों में है।लाख मनाने पर भी भरत नहीं मानते और गुरु तथा राम के आदेश के बाद भगवान राम की खड़ाऊ अपने सिर पर रख कर वापस अयोध्या आते हैं तथा सिंहासन पर प्रभु श्रीराम के खड़ाऊ का राजतिलक कर वनवासी जीवन व्यतीत करने के साथ अयोध्या के राज्य का दायित्व निर्वहन करने लगते हैं। कथा के सार को समझाते हुए साध्वी ने कहा कि वर्तमान में यदि सत्ता तथा सत्ता का सही लाभ को भरत के चरित्र से समझा जाए तो रामराज्य की कल्पना अवश्य की जा सकती है। कथा श्रवण कर रहे राम जानकी मंदिर के पुजारी सूर्य नारायण दास वैदिक,महंत कन्हैया दास जी संत समाज के अध्यक्ष,महंत सियाराम दास जी,कटरा कुटी धाम के महंत चिन्मयानंद बापू जी,पवन दास शास्त्री जी,चंद्रमणि पांडे एवं सुदामा जी,नीरज दास जी,नितेश दास जी,उदयभान सिंह,शिवपूजन तिवारी,विनय तिवारी,डॉ आर के मौर्या,के के उपाध्याय,शिव कुमार मिश्रा,विनोद पांडे,संतोष पांडे,शिवम तिवारी,विशाल तिवारी,संपूर्णानंद ओझा,अरविंद पांडे,राम बहादुर पांडे,बृजेश शुक्ला, चंद्रधर शुक्ला,विक्रम सिंह,दुर्गेश सिंह,हिमांशु मिश्रा,रामसेवक वर्मा,रामपाल मिश्रा,अमन मिश्रा,स्वर्णलता पूजा,स्वाति,गरिमा,ब्यूटी मिश्रा,राधा पाठक सहित क्षेत्र के तमाम लोग उपस्थित रहे।

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