गांव में बागवानी से रोजगार के अवसर।

कोरोना संकट काल में शहरों से गांव की ओर पलायन कर रहे प्रवासी श्रमिकों के जीवन यापन के लिए गांव में रोजगार के अवसर की श्रृंखला में बागवानी से रोजगार के विभिन्न आयाम का विश्लेषण कर रहे हैं प्रवीण कुमार तिवारी।

प्रवीण कुमार
(लेखक साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं।
)

कोरोना संकट में जो लोग शहरों से गांव वापस आ रहे हैं उनके लिए गांव में रोजगार के अनेक अवसर हो सकते हैं। जिसमें बागवानी एक बेहतर विकल्प है। फलों के उत्पादन के द्वारा न केवल पर्याप्त धन कमाया जा सकता है बल्कि इसके द्वारा वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण प्रदूषण से भी निपटने में सहायता मिलेगी। गांव में जो जमीन बंजर ,अप्रयुक्त, ऊसर,परती, सड़कों और नहरों आदि के किनारे पड़ी हैं उनमें फलदार वृक्ष लगाए जा सकते हैं। फलों में विटामिन, खनिज, लवण, फाइबर और अनेक एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो हमारे सेहत के लिए बहुत लाभदायक होते हैं। संतुलित आहार में लगभग 100 ग्राम फल प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य होता है। भारत पूरी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फल उत्पादन करने वाला देश है और इसमें अभी असीम संभावनाएं विद्यमान हैं।

आम, केला, अमरूद, पपीता जैसे फलों के उत्पादन में हमारा देश पूरी दुनिया में प्रथम स्थान पर है। उत्तर प्रदेश की बात की जाए तो फलों के राजा आम के उत्पादन में इसका प्रथम स्थान है। इसका मलिहाबाद क्षेत्र पूरी दुनिया में आम के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। आम को फलों में श्रेष्ठ माना जाता है। इसे राष्ट्रीय फल भी कहा जाता है। भारत से विदेशों में खासकर यूरोप और खाड़ी देशों में आम का निर्यात किया जाता है। जिसमें हापुस, अल्फांसो, केसर, गुलाब, खास आदि किस्मों की बहुत मांग है। आम की अन्य प्रसिद्ध किस्में दशहरी, चौसा, लंगड़ा, आम्रपाली, सिंधु, नीलम, आदि हैं। आम से अनेक उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं जैसे आचार,जैम  जेली, आमचूर, आम, पापड़, मैंगो शेक आदि। आम में विटामिन ए तथा विटामिन सी की प्रचुरता होती है। यह सेहत के लिए गुणकारी और ऊर्जा देने वाला फल है।

केले के उत्पादन में भी भारत पूरी दुनिया में प्रथम स्थान पर है। इसे मुख्य रूप से पकाकर और सब्जी के रूप में खाया जाता है। केले में विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी और प्रचुर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट होता है। इसकी प्रमुख किस्में नरेंद्र जो की चिप्स बनाने के लिए सबसे उपयुक्त किस्म है। इसके अलावा मंथन जो सब्जी के लिए उपयुक्त प्रजाति है। केले की अन्य किस्में बसराई हरीराम, बल्लाह, कोहिया आदि हैं। केले का उत्पादन एक हेक्टेयर में लगभग 10 टन हो सकता है। इसे पकाने के लिए एथिलीन गैस का प्रयोग किया जाता है। केले के पेड़ लगभग 3 मीटर की दूरी पर लगाना चाहिए। पपीते की खेती के द्वारा भी कम समय में अच्छा लाभ हो सकता है। पपीते  को पकाकर और सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसके दूध से पपेन प्राप्त किया जाता है। जिसको दवाइयों में प्रयोग किया जाता है। पपीता विटामिंस और फाइबर का अच्छा स्रोत है। यह पेट के लिए अत्यंत फायदेमंद है। पपीते की प्रमुख किस्में पूसा नन्हा,पूसा जायंट,हनी ड्यू आदि है।नींबू वर्गीय पौधों के द्वारा भी धन अर्जन किया जा सकता है। इस वर्ग में संतरा,मौसंबी,नींबू,फालसा आदि वृक्ष आते हैं। जिसमें 50% अकेले संतरा है। संतरे के लिए सबसे उपयुक्त स्थान थोड़ा ऊंचाई लिए पठारी क्षेत्र होता है। यह भारत में नागपुर के क्षेत्र में सर्वाधिक होता है। नींबू बहुत ही गुणकारी और औषधीय महत्त्व का होता है। इसमें विटामिन सी की प्रचुर मात्रा पाई जाती है। नींबू एंटी ऑक्सीडेंट का भी काम करता है। जो अनेक रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। इसका उपयोग पेट के विकारों को ठीक करता है। नींबू से अचार आदि अन्य उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। इसका उपयोग शरबत और शिकंजी के रूप में भी किया जा सकता है। नींबू की प्रमुख प्रजातियां कागजी नींबू,मालिनी चक्रधर साईं,अभयपुरी लाइम आदि है। उत्तर प्रदेश में नींबू की खेती बहुत आसानी से की जा सकती है। अमरूद को गरीबों का सेब कहा जाता है। यह बहुत ही गुणकारी फल है। इसमें आयरन पोटैशियम जैसे खनिज और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

उत्तर प्रदेश में पूरे भारत का सर्वाधिक अमरूद पैदा होता है। इसकी प्रमुख किस्में इलाहाबादी, सफेदा,लखनऊ 49, सरदार, ललित आदि है। अमरूद के पेड़ से साल भर फल लिया जा सकता है लेकिन जाड़े के मौसम में सबसे अच्छा फल प्राप्त होता है। 

आंवले को सबसे गुणकारी फल कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। आंवला हृदय रोग ,पेट के रोग और त्वचा रोग के लिए महत्वपूर्ण औषधीय फल  है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है जो कैंसर रोधी होता है। आंवले को कॉस्मेटिक में भी उपयोग किया जाता है। बालों और आंखों के लिए यह बहुत लाभदायक है। विटामिन सी की मात्रा और गुणवत्ता में यह फल बेजोड़ है। इसकी प्रमुख किस्में बनारसी कृष्णा चकिया फ्रांसिस कंचन आदि है। आंवले को लवणीय मृदा में भी उगाया जा सकता है। आंवले से मुरब्बा,लड्डू,अचार और अनेक औषधियां बनाई जा सकती हैं। उत्तर प्रदेश का प्रतापगढ़ जनपद आंवला उत्पादन के लिए पूरे भारत में प्रसिद्ध है।

देश में जब से शुगर के पेशेंट बढ़े हैं तब से जामुन की महत्ता और बढ़ गई है। जामुन का फल,बीज, छाल सब का उपयोग किया जा सकता है। जामुन में ग्लूकोस फ्रुक्टोज खनिज प्रोटीन पाया जाता है। इसके बीज में प्रचुर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाया जाता है। जामुन की प्रमुख किस्में जामवंत,राजा जामुन आदि हैं। इसका सिरका मधुमेह रोगियों के लिए वरदान से कम नहीं है।बेल एक गुणकारी और कम उपजाऊ जमीन में भी आसानी से होने वाला पौधा है। यह पेट,शुगर,त्वचा रोग, पाचन क्रिया आदि के लिए औषधीय महत्त्व रखता है। इसे मुरब्बा,कैंडी,शरबत पाउडर भूनकर उपयोग में लाया जा सकता है। बेल की प्रमुख प्रजातियां नरेंद्र बेल,5 पंत, अर्पणा,पंत,उर्वशी,कागजी,इटावा,मिर्जापुरी,कागजी, गोंडा आदि है। कटहल पकाकर और सब्जी के रूप में उपयोग में लाया जा सकता है। इसमें शर्करा और पेक्टिन पाया जाता है। खनिज के रूप में कैल्शियम,फास्फोरस, लौह तत्व की प्रचुरता होती है। इसमें विटामिन ए पर्याप्त रूप से होता है। यह सदाबहार पौधा है। खजुवा स्वर्ण मनोहर सब्जी के लिए स्वर्ण पूर्ति और नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय फैजाबाद के द्वारा मत्तमवक्का  महत्वपूर्ण प्रजाति है। 

छोटी खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के लिए 10000 करोड़ रुपये
वित्त मंत्री ने कहा कि माइक्रो फूड इंटरप्राइज (एमएफई) के लिए 10,000 करोड़ की स्कीम लाई गई है. उन्होंने कहा कि इससे खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत में काम करने वाली छोटी इकाइयों को फायदा होगा. उन्होंने कहा कि बिहार में मखाना, केरल में रागी, कश्मीर में केसर, आंध्र प्रदेश में मिर्च, यूपी में आम का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है. क्लस्टर बनाकर इन चीजों के उत्पादन से जुड़ी इकाईयां इस फंड का फायदा उठा सकती हैं. इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकल के लिए वोकल का मकसद भी पूरा होगा. एमएफई के साथ ही इन फसलों से जुड़े किसानों की भी आय बढ़ेगी. ये इकाईयां वेलनेस, न्यूट्रिशनल और सेहत से जुड़े उत्पाद बनाने पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी.
रुकेगा किसानों का उत्पीड़न
किसानों के लिए सुविधाजनक ऐसा कानूनी ढांचा बनाया जाएगा, जिसके तहत उसे निश्चित आमदनी हो. जोखिम रहित खेती के लिए उपाय किए जाएंगे. इसके अलावा फसल की गुणवत्ता का मानकीकरण किया जाएगा. इससे किसानों के जीवन में बदलाव जाएगा. वह बड़े खुदरा व्यापारी, निर्यातकों के साथ पारदर्शिता के साथ काम कर सकेंगे. इससे उनका उत्पीड़न रुकेगा. केंद्र सरकार इसके लिए कानून बनाएगी।

गांव में खेती पशुपालन और बागवानी यह तीन प्रमुख आधार स्तंभ हैं और इन तीनों के समन्वय के द्वारा न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था बल्कि देश का आर्थिक विकास संभव है।

किसान जहां चाहें वहां बेच सकेंगे फसल
किसान को अभी कृषि विपणन मंडी समिति यानी एपीएमसी लाइसेंस धारकों को ही अपना उत्पाद बेचना पड़ता है. किसानों को अपने उत्पाद की सही कीमत मिले और दूसरे राज्यों में जाकर भी उत्पाद बेच सकें उसके लिए कानूनी में बदलाव किया जाएगा. एक केंद्रीय कानून के तहत उन्हें किसी भी राज्य में अपना उत्पाद ले जाकर बेचने की छूट होगी. इससे किसानोंं को उनकी फसल की सही कीमत मिल सकेगी.

आज आवश्यकता है कि जो लोग शहरों से गांव  में वापस आए हैं उन्हें वहीं रोजगार मिले। इसके लिए फलों का उत्पादन एक प्रभावी जरिया हो सकता है। इससे खाली पड़ी जमीन भी वृक्षों से आच्छादित हो जाएगी और गांव में लोगों को आर्थिक रूप से लाभ भी होगा। आवश्यकता इस बात की है की लोगों को इनका उचित मूल्य मिले। 

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