परिवर्तन

रचनाकार- वर्षा शर्मा
(लम्भुआ, सुल्तानपुर)

नित होते नए परिवर्तनों से
रे मनुज! क्यों है परेशान तू,
तू भी तो नित-नित बदला है
क्यों गया सबकुछ भूल तू??
प्रकृति के अंचल में पलकर
उसको ही तू लूट चला
स्वार्थसिद्धि में लिपट तू ही
प्रकृति के नियमों को तोड़ चला
जब खुद पर विपत्ति आयी तो
क्यों गया सबकुछ भूल तू??
पक्षी तो मासूम थे,
तुमने उनको भी न छोड़ा था
थोड़े दाने देकर जाल में उनको फाँसा था,
गाय जो है मातृ-तुल्य
उसका भी वध किया गया
फिर जब अपनी बारी आयी तो
क्यों गया सबकुछ भूल तू??
नित होते नए परिवर्तनों से
रे मनुज ! क्यों है परेशान तू..

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