पुलिस सेवा आधारित पंक्तियां।

गिनोगे तो मिलेंगे, दिन सात हर बार
मेरे हिस्से में नहीं आता मगर इतवार जाने क्यों?
जिनके लिए खड़े रहे तपती धूप, कड़ी ठंडक, मूसला बारिश में हर बार,
उन्हे दर्द न समझ आता हमारा
जाने क्यों?
हर रोज सफर करते गुजरते दर्द- पीड़ा से,
छोड़ परिवार जनता की सुरक्षा में खड़े रहते,
फिर भी ना छोड़ा जाता ये वतन से प्यार जाने क्यों?
जनता की सुरक्षा के दौरान जाने गवाई कई बार,
बिछड़ा परिवार, सूना हुआ घरबार,
फिर भी परिवार की तरसती आंखों को ना मिला सम्मान
जाने क्यों?
गिनोगे तो मिलेंगे, दिन सात हर बार
मेरे हिस्से में नही आता मगर इतवार जाने क्यों?
~रंजना ध्रुवप्रकाश
(वरिष्ठ पत्रकार/ सोशल एक्टीविस्ट )

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