त्रिकालदर्शी थे महर्षि वेदव्यास, उन्होंने वेदों को चार भागों में विभाजित किया: गोपाल शर्मा

Vijaydoot News

मथुरा। सर्वोदयी ब्राह्मण विकास संस्थान (पंजीकृत) के तत्वावधान में दाऊजी मंदिर स्थित गायत्री मंदिर परिसर में महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास प्रादुर्भाव महोत्सव श्रद्धा एवं उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर घनश्याम हरियाणा की अध्यक्षता में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वानों ने महर्षि वेदव्यास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पंडित कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी, संस्थान अध्यक्ष पंडित सोहनलाल शर्मा, नारायण प्रसाद शर्मा, मुकट मणि शर्मा, संजय हरियाणा, सुरेंद्र खोना, कृष्ण कुमार भारद्वाज एवं कार्यक्रम संयोजक लीलाधर शर्मा ने महर्षि वेदव्यास के चित्र पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पुष्प एवं माल्यार्पण कर किया।

मुख्य अतिथि पंडित कामेश्वर नाथ चतुर्वेदी ने कहा कि आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का प्रादुर्भाव दिवस मनाया जाता है। उन्होंने वेदों का संकलन एवं विस्तार कर मानव समाज को अमूल्य ज्ञान प्रदान किया। इसी कारण गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।

श्री जगद्गुरु श्री विष्णु प्रपन्नाचार्य जी महाराज ने महर्षि वेदव्यास के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उनके पिता महर्षि पराशर और माता सत्यवती थीं। बाल्यकाल से ही उन्होंने वेदों का गहन अध्ययन और स्मरण किया।

विनोद शर्मा ने महर्षि वेदव्यास को ज्योतिष शास्त्र का प्रवर्तक बताया, जबकि पंडित सोहनलाल शर्मा ने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत जैसे महान ग्रंथ की रचना कर भारतीय संस्कृति को अमूल्य धरोहर दी। प्रेमचंद दीक्षित (राजगुरु) ने कहा कि वेदव्यास अनेक ग्रंथों के रचयिता होने के साथ-साथ गुरुओं के भी गुरु थे।

गोपाल प्रसाद शर्मा ने कहा कि महर्षि वेदव्यास त्रिकालदर्शी थे। उन्हें यह आभास था कि कलियुग में मनुष्य की आयु, स्मरण शक्ति और अध्ययन क्षमता कम हो जाएगी। इसी कारण उन्होंने विशाल वेद को चार भागों ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित कर मानव समाज के लिए अध्ययन को सरल बनाया। इसी महान कार्य के कारण उन्हें वेदव्यास की उपाधि प्राप्त हुई।

नारायण प्रसाद शर्मा ने बताया कि महर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों की भी रचना की, जो भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म की अमूल्य धरोहर हैं।

इस अवसर पर सात विद्वान विप्रों को माला, पटका, दुशाला एवं महर्षि वेदव्यास की प्रतिमा भेंट कर सम्मानित किया गया। संगोष्ठी में अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम में डॉ. जमुना शर्मा, अनन्या पचौरी, कृष्ण कुमार भारद्वाज, रोहित गौड़, पंकज शर्मा, भगवान साहू, संजय हरियाणा, दिवाकर आचार्य, मुकट मणि शर्मा, रामगोपाल शर्मा, राजकुमार, जगदीश प्रसाद शर्मा, दिलीप पांडे, महेंद्र दत्त आचार्य सहित अनेक गणमान्यजन उपस्थित रहे।