वन्यजीव खत्म तो जंगल खत्म और इंसान की सांसे भी खत्म।

Vijaydoot News

(अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस विशेष – 29 जुलाई 2026)

विचार मंथन: पृथ्वी पर मौजूद हर जीव अपनी अलग पहचान और भूमिका के साथ प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देता हैं। खाद्य श्रृंखला की हर कड़ी आवश्यक है, क्योंकि किसी एक जीव का भी असंतुलन पूरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर सकता हैं। आज के समय में मनुष्य को छोड़कर सभी जीव प्रकृति की रक्षा में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। स्वच्छ हवा, साफ पानी और पर्याप्त भोजन सभी के जीवन के लिए जरूरी है, और ये तभी मिल सकते है जब पर्यावरण स्वस्थ और संतुलित हो। सूक्ष्म जीव मिट्टी को उपजाऊ बनाते है, जबकि पक्षी और वन्य प्राणी बीजों का प्रसार करके नए पौधों और वनों के विकास में सहायता करते हैं। जब जंगलों में जीव-जंतु सुरक्षित रहते है, तब वन हरे-भरे बने रहते है, मौसम का चक्र संतुलित रहता है, जलस्रोत सुरक्षित होते है और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण होता हैं। इससे प्रदूषण कम होता है, बीमारियों का खतरा घटता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर होती हैं। वास्तव में वन्यजीव प्रकृति के सच्चे संरक्षक है, क्योंकि वे पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। मनुष्य के बिना प्रकृति स्वयं को तेजी से पुनर्जीवित कर सकती है, किंतु प्रकृति के अभाव में मानव जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है, इसलिए प्रकृति और वन्यजीवों का संरक्षण हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी हैं।

सभी जीवों को अपने प्राकृतिक अधिवास में जीने का अधिकार है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप के कारण वन्यजीवों और मानवों के बीच संघर्ष बहुत ज्यादा बढ़ गया हैं। इसमें हानि दोनों को होती है, मनुष्य भी जान गवांते है और वन्यजीव भी। आजादी के पहले राजा-महाराजाओं और अंग्रेजों ने शिकार करके जंगली जानवरों की संख्या बेहद कम कर दी। अधिकतम प्रजातियां तो हमेशा के लिए विलुप्त भी हो गयी। तेजी से घटती वन्यजीवों की संख्या को बचाने सरकार ने कानून बनाये हैं।

आयआयटी बॉम्बे और सस्त्रा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक रिसर्च में पाया गया कि साल 2015 – 2019 के बीच, देश में हर 1 वर्ग किलोमीटर जंगल बढ़ने के बदले लगभग 18 वर्ग किलोमीटर जंगल खत्म हो गए। प्राकृतिक घने और पुराने जंगल तेज़ी से खत्म हो रहे है, अगर यही स्थिति रही तो, इसमें रहनेवाले वन्यजीव भी बुरे तरीके से प्रभावित होंगे ही, अर्थात उनका जीवन संकट में होगा। आज देश में बढ़ते शहरीकरण के कारण, पारंपरिक खेती कम हो रही है, शहरों के आसपास के गाँवो में कांक्रीट के जंगल बढ़ रहे है, जिसके कारण जंगल सिकुड़ रहे और मानवीय गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। जंगलों के पास, प्रकृति की गोद में लोगों को आबाद करने के लिए फार्महाउस बनाने का ट्रेंड चल पड़ा हैं। विकास के नाम पर जंगलों के बीच से महामार्ग बनाएं जा रहे और जंगलों को काटकर उत्खनन का काम चल रहा हैं। इससे सीधे तौर पर वन्यजीवों के प्राकृतिक अधिवास नष्ट हो रहे हैं। साल-दर साल प्राकृतिक आपदाएं लगातार बढ़ रही हैं।

जिन वनों में बाघ रहते है, वहां का पारिस्थितिक तंत्र अधिक समृद्ध और संतुलित होता हैं। बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे जंगल के संरक्षक हैं। जीवित रहने के लिए उन्हें विशाल, सुरक्षित और मानवीय हस्तक्षेप से मुक्त आवास चाहिए। ऐसे क्षेत्रों की रक्षा से असंख्य वन्य प्राणी, वनस्पतियां, सूक्ष्म जीव और पूरी जैव-विविधता सुरक्षित रहती हैं। बाघ शाकाहारी जीवों की संख्या नियंत्रित करते हैं, जिससे वनस्पतियों का अत्यधिक दोहन रुकता है और प्राकृतिक संतुलन बना रहता हैं। सुरक्षित जंगल अधिक कार्बन सोखते है और जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कम करने में मदद करते हैं। साथ ही, ये घने वन वर्षा जल के प्रवाह को नियंत्रित कर बाढ़ की तीव्रता घटाते है और करोड़ों लोगों को मीठा पानी देते हैं। इसलिए बाघों और उनके आवासों की रक्षा पूरे पर्यावरण की रक्षा हैं। यह संरक्षण मानव जीवन, कृषि, जलस्रोतों और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी अत्यंत आवश्यक हैं।

हर साल 29 जुलाई को “अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस” खतरे में पड़ी बड़ी बिल्लियों की प्रजातियों और उनके प्राकृतिक अधिवास को बचाने के बारे में जागरूकता बढ़ाने हेतु मनाया जाता हैं। बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है, बाघ बचाओं, जंगल बचाओं, प्रकृति बचाओं यह नारा दिया जाता है, क्योंकि यह बचेंगें तो ही हम बचेंगें, यह समझना बहुत जरुरी हैं। ग्लोबल टाइगर फोरम के अनुसार, दुनिया भर के जंगल में सिर्फ़ 5,660 टाइगर बचे हैं। देश के नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी की रिपोर्ट “स्टेटस ऑफ़ टाइगर्स इन इंडिया : को-प्रिडेटर्स एंड प्रे 2022” के अनुसार, इनमें से 3,682 भारत में पाए जाते हैं। हर साल सड़क दुर्घटनाओं, खेतों में करंट से, खुले कुएं में गिरकर और शिकार द्वारा असंख्य वन्यजीवों की बेदर्दी से असमय मौत होती हैं। विदर्भ क्षेत्र (महाराष्ट्र) के समाचारपत्रों में अक्सर वन्यजीवों के मौत की खबर सुर्खियां बनी रहती है, विशेषकर बाघों के मौत की। आये दिन बाघों की मौत चिंता का विषय है, पिछले छह माह में महाराष्ट्र में कुल 24 बाघों की मौत हो चुकी हैं। साल 2025 के दौरान मध्यप्रदेश राज्य में कुल 54 बाघों की जान चले गयी और महाराष्ट्र राज्य के वनमंत्री गणेश नाईक ने बताया कि, महाराष्ट्र राज्य में 41 बाघों की मौत हुयी।

वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर अनुसार, हर बाघ की पहचान उसकी धारियों के अलग पैटर्न से होती है, ठीक वैसे ही जैसे हर इंसान के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं। मादा बाघ अपने शावकों से संवाद करने के लिए कानों के पीछे बने सफेद निशानों का उपयोग करती है, जो उनके लिए संकेतों की तरह काम करते हैं। दुनिया के आधे से अधिक बाघ भारत में पाए जाते है, जो देश की समृद्ध जैव-विविधता का बड़ा प्रमाण हैं। बाघ अलग-अलग परिस्थितियों में गुर्राने, दहाड़ने, कराहने, फुफकारने और हांफने जैसी आवाज़ों से संवाद करते हैं। माना जाता है कि बाघ लगभग 20 लाख वर्षों से पृथ्वी पर मौजूद है, लेकिन पिछले सौ वर्षों में मानवीय हस्तक्षेप, जंगलों की कटाई और अवैध शिकार के कारण इनकी संख्या में लगभग 97 प्रतिशत की कमी आई हैं। इसी वजह से इन्हें लुप्तप्राय प्रजाति माना गया है, आज भी अवैध शिकार इनके लिए बड़ा खतरा हैं। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर एशिया में इनके संरक्षण के लिए लगातार काम कर रहा हैं। वर्ष 2016 में कुछ क्षेत्रों में बाघों की संख्या बढ़ने की खबर मिली, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया में इनकी आबादी अब भी घट रही हैं।

मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के पास आज कानूनी अधिकार, उन्नत तकनीक, प्रसार माध्यम, सरकार, न्याय प्रणाली, सोशल मीडिया, रिश्तेदार, मित्र-परिवार और समाज है, फिर भी उच्चशिक्षित और जागरूक मनुष्य होकर भी अनेक मौकों पर वह खुद को ठगा सा महसूस करता हैं। अपनी समस्या को लेकर सरकारी दफ्तरों, नेताओं और न्यायालय के चक्कर काटकर भी बहुधा संतोषजनक समाधान नहीं पाता हैं। बरसात में बाढ़ की समस्या, गर्मी में अकाल, लू और जल की कमी, ठंडी में कोहरे और हाइपोथर्मिया की समस्या और प्राकृतिक आपदाएं। अगर इंसान सर्व सुविधा सम्पन्न होकर ऐसी परिस्थितियों में विवश हो जाता है, तो फिर इसके मुकाबले वन्यपशुओं की स्थिति का तो अंदाजा भी लगाना मुश्किल हैं। फिर सोचिए जरा मूक वन्यजीवों के नजरिये से, जिन्हे मनुष्य से नहीं बल्कि प्रकृति से केवल भूख-प्यास की पूर्ति की आस है और प्रकृति समस्त जीवों के भरणपोषण में बहुत सक्षम है, अगर मानवी हस्तक्षेप न हो तो। फिर हम वन्यजीवों को परेशान कर रहे है क्या? या वन्यजीव हमें परेशान कर रहे है? बढ़ते वन्यजीव व मानवी संघर्ष के लिए आखिर कौन जिम्मेदार है? वक्त रहते इसका गहराई से विचार करना बहुत जरुरी हैं।