प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला और बहु-विवाह के नाम पर एक महिला के यौन उत्पीड़न और शोषण से जुड़े गंभीर मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर एवं न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने आरोपियों की याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि मामले में गहन जांच की जरूरत है, इसे शुरुआती स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि यह मामला समाज के उस हिस्से की तस्वीर पेश करता है जो समानता, गोपनीयता व व्यक्तिगत सम्मान जैसे संवैधानिक मूल्यों और आकांक्षाओं से कोसों दूर है।
रिकॉर्ड पर आए तथ्य आत्मा को झकझोर देने वाले हैं। कोर्ट ने पर्सनल लॉ की आड़ लेने वाले आरोपियों को कड़ा संदेश देते हुए स्पष्ट किया कि देश के आपराधिक कानून में व्यक्तिगत कानूनों को ढाल बनाकर किसी अपराध (विशेषकर यौन हिंसा) को सही नहीं ठहराया जा सकता। इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ पर्सनल लॉ का हवाला देकर बनाया गया कोई भी शारीरिक संबंध पॉक्सो एक्ट और कानूनन बलात्कार के दायरे में आता है।
कोर्ट ने याचियों की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि कुछ लोगों की भूमिका सिर्फ निकाह पढ़ने या गवाह बनने तक सीमित थी। कोर्ट ने कहा कि यह पूरी घटना एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होती है, जिसकी जांच जरूरी है। कोर्ट ने याचिकाओं को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया। साथ ही पूर्व में दिए गए सभी अंतरिम आदेशों को रद्द करते हुए पुलिस को मामले की निष्पक्ष और पूरी जांच करने के निर्देश दिए हैं।