•कहीं छह माह से अंधेरा, कहीं दो साल से बंद पड़ी लाइटें
शिकायतों के बावजूद जिम्मेदारों की नींद नहीं टूट रही।क्ष
बल्दीराय/सुल्तानपुर। बल्दीराय तहसील क्षेत्र में विकास के नाम पर लगाई गई स्ट्रीटलाइटें अब खुद सरकारी व्यवस्था में व्याप्त बड़े भ्रष्टाचार की बदहाली की कहानी बयां कर रही हैं। लाखों रुपये खर्च कर सार्वजनिक स्थानों और बाजारों में लगाई गई रोशनियां लंबे समय से बंद पड़ी हैं, लेकिन उनकी मरम्मत कराने की जिम्मेदारी उठाने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। सवाल यह है कि जब लाइटें लगाने के समय बजट और व्यवस्था सक्रिय रहती है तो खराब होने के बाद उनकी सुध लेने में जिम्मेदारों को इतनी देर क्यों लगती है?
छह माह से बंद लाइट, फिर भी अंधेरे में पुलिस चौकी
हरौरा बाजार नहर चौराहा स्थित पुलिस चौकी की स्ट्रीटलाइट करीब छह माह से बंद बताई जा रही है। चौराहा अंधेरे में डूब जाता है। पीरोसरैया ठाकुरबाबा चौराहे की लाइट लगभग चार माह से खराब है। बल्दीराय कस्बे और बहुरावां बाजार में आशाराम यादव के दरवाजे के पास लगी स्ट्रीटलाइट करीब दो वर्ष से बंद पड़ी है। ऐंजर में रूपेश द्विवेदी, रामउचित द्विवेदी के दरवाजे की स्ट्रीटलाइट लगभग एक वर्ष से खराब है, जबकि डीह मोड़ भवानीगढ़ की लाइट भी करीब एक साल से अंधेरा फैला रही है। ठीक यही हाल तिरहुति बाजार के स्ट्रीटलाइट की है 18 मजह से बंद है।
लाइट लगाने में दिलचस्पी, रखरखाव में क्यों नहीं ?
इन बंद स्ट्रीटलाइटों की लंबी सूची, व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। यदि सार्वजनिक धन से लाइटें लगाई गई हैं तो उनके रखरखाव की जिम्मेदारी किस विभाग, संस्था या एजेंसी की है ? क्या लाइट लगाने के बाद उसकी गुणवत्ता और वारंटी की जांच हुई ? खराब लाइटों की मरम्मत के लिए कोई शिकायत रजिस्टर या नियमित निरीक्षण व्यवस्था है ? यदि है तो कहां हैं जिम्मेदार अथवा क्षेत्र के जन प्रतिनिधि । क्या प्रशासन को ऐसे जन समस्याओं के प्रति संज्ञेय नही होना चाहिए ? जिम्मेदारों की भूमिका पर ये बड़े सवाल हैं ?
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कमीशनखोरी के आरोपों की हो निष्पक्ष जांच
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विकास कार्यों में कमीशनखोरी के कारण गुणवत्ता से समझौता किया जाता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र जांच जरूरी है। प्रशासन को चाहिए कि स्ट्रीटलाइटों की खरीद, स्थापना, भुगतान, गुणवत्ता, वारंटी और मरम्मत संबंधी अभिलेखों की जांच कराए। यदि कहीं सरकारी धन का दुरुपयोग या अनियमितता, भ्रष्टाचार सामने आती है तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो। अंधेरे में डूबे चौराहे और बाजार केवल खराब लाइटों की समस्या नहीं, बल्कि जवाबदेही के अंधेरे के भी प्रतीक हैं। अब देखना है कि प्रशासन इन बंद पड़ी स्ट्रीटलाइटों को रोशनी देता है या इस बड़े भ्रष्टाचार पर पर्दा डालते हुए फाइलों में ही विकास चमकाता रहेगा।


