गांव में पशुपालन से रोजगार।

कोरोना संकट काल में शहरों से गांव की ओर पलायन कर रहे प्रवासी श्रमिकों के जीवन यापन के लिए गांव में रोजगार के अवसर के क्रम में पशुपालन से रोजगार का विश्लेषण कर रहे हैं प्रवीण कुमार तिवारी।
प्रवीण कुमार
लेखक स्तंभकार हैं।

कोरोना संकट में शहर से गांव वापस आए लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गांव में ऐसा कौन सा कार्य किया जाए जिससे इतनी आय हो सके कि वापस शहर ना जाना पड़े।  लोगों के लिए पशुपालन एक बेहतर विकल्प हो सकता है। बीसवीं पशु गणना 2017 के अनुसार देश में कुल पशुओं की संख्या लगभग 535 मिलियन है। कुल पशुओं की संख्या की दृष्टि से देखें तो वर्ष 2012 में हुई 19वीं पशु गणना से 4.6% की वृद्धि हुई है। उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में मवेशियों की संख्या में सर्वाधिक कमी हुई है जबकि सबसे ज्यादा वृद्धि पश्चिम बंगाल में देखी गई है। देश में दुधारू पशुओं की संख्या में 6% की वृद्धि हुई है। कुल मवेशियों में गोवंश 35.9 प्रतिशत ,भैंस 20.4 प्रतिशत है। संकर नस्ल के मवेशियों की संख्या में सबसे अधिक वृद्धि की प्रवृत्ति देखी गई है तथा देसी नस्ल के पशुओं की संख्या में सर्वाधिक कमी हुई है। यद्यपि सरकार ने राष्ट्रीय गोकुल मिशन जैसी योजना के माध्यम से देशी गोवंश के संरक्षण का प्रयास किया है लेकिन फिर भी स्थिति चिंताजनक है।         

दुधारू पशुओं में गाय, भैंस, बकरी मुख्य रूप से शामिल हैं। गाय की पूरे विश्व में लगभग 50 नस्लें पाई जाती हैं। जिनमें लगभग 39 नस्लें भारतीय मूल की हैं। विदेशी नस्लों में जर्सी एचएफ या होल्सटीन, फ्रिसियन, ब्राउन स्विस आदि प्रमुख हैं। जो भारत में दुग्ध उत्पादन के लिए पाली जाती हैं। इनमें दूध की मात्रा अधिक होती है लेकिन इनके दूध में वसा या फैट की मात्रा दो से तीन परसेंट ही होती है। इनका दूध स्वाद और गुण दोनों में देसी गाय के मुकाबले कम है वहीं इनके बछड़े कृषि और अन्य भार कार्यों के लिए अनुपयोगी हैं। यह गोवंश मूलतः ठंडी जलवायु वाले क्षेत्रों की हैं इसलिए हमारे गर्म और आर्द्र जलवायु में इन्हें समस्या होती है। इनके पालन के लिए बहुत अच्छी देखरेख और सुविधा की व्यवस्था करनी पड़ती है।     

देसी गायों की दूध देने वाली प्रमुख नस्लें साहिवाल, गिर, राठी, थारपरकर, हरियाणा लाल, सिंधी आदि हैं। इनमें सिंधी और साहिवाल नस्ल मूल रूप से पंजाब के पाकिस्तान सीमा से लगे क्षेत्र से सम्बंधित हैं। गिर नस्ल की गाय मुख्य रूप से गुजरात मूल की हैं। थारपरकर और राठी मूलतः राजस्थान की हैं और हरियाणा नस्ल की गाय मूल रूप से हरियाणा में मिलती है। आज के संदर्भ में इन गांव गायों को भारत के किसी भी क्षेत्र में पाला जा सकता है। यह गोवंश बड़ी आसानी से वहां अनुकूलित हो जाती हैं।

देसी नस्ल की गायों के दुग्ध उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। साहीवाल नस्ल की गाय एक ब्यांत (लगभग 300 दिन) में लगभग तेईस सौ लीटर दूध देती है। यह सुधार निरंतर प्रयास, संरक्षण एवं संवर्धन के कारण हुआ है। देशी गोवंश के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इस कारण इन्हें बीमारियां होने की संभावना न के बराबर होती है। इन गायों के रखरखाव और आहार का खर्च विदेशी नस्ल की गायों तथा भैंसों के मुकाबले काफी कम होता है। इनके बच्चों की मृत्यु दर भी इनसे कम होती है। जिससे पशुपालक को लाभ और सहूलियत होती है।

एक रिसर्च के अनुसार देसी गायों के दूध में A2 प्रोटीन पाया जाता है जो हृदय रोगियों तथा अन्य बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए औषधीय महत्त्व रखता है। इनका दूध बच्चों के लिए भी ज्यादा गुणकारी माना जाता है। इनके गोबर से अनेक उत्पाद जैसे महाजीवन अमृत आदि बनाए जा सकते हैं। जिसको ऑर्गेनिक कृषि के लिए रासायनिक उर्वरकों के विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है। गोमूत्र से फ्लोर क्लीनर तथा कीटनाशक तैयार किया जा रहा है। इन सारे कारणों से देसी गाय का पालन व्यापक हित में है।       

उत्तर प्रदेश में वर्तमान समय में चक गंजरिया फार्म बाराबंकी में साहिवाल गायों का संरक्षण, संवर्धन एवं अनुसंधान किया जा रहा है। यह 1948 में स्थापित सरकारी संस्थान है। इसी तरह नैनी प्रयागराज में कृषि विद्यालय में लाल सिंधी गायों का सबसे पुराना फार्म है। इसकी स्थापना 1910 में की गई थी। यहां मुख्य रूप से देसी गायों से संकर नस्लों को तैयार करने के क्षेत्र में कार्य किया जा रहा है। इसी तरह 1889 ई. में स्थापित आईवीआरआई इज्जत नगर (बरेली) में पशुपालन के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण और उन्नत नस्ल के गोवंश उपलब्ध कराए जाते हैं। 

देश में भैंस की कुल सात नस्लें मिलती हैं। इनमें मुर्रा, भदावरी, सुरती आदि प्रमुख हैं। मुर्रा नस्ल की भैंस हरियाणा मूल की है। यह काले रंग की विशाल आकार की तथा सर्वाधिक दूध देने वाली नस्ल इसकी सींग गोलाकार मुड़ी रहती है  तथा पूछ लंबी होती है। इसके माथे पर सफेद टीका तथा पूंछ के बाल नीचे सफेद होते हैं। आयन विकसित होते हैं। इसके दूध में छह से सात पर्सेंट वसा पाया जाता है। भदावरी नस्ल की भैंस कद काठी से मुर्रा से छोटी होती है। दूध की मात्रा मुर्रा से कम होती है लेकिन वसा की मात्रा 8-9 परसेंट होती है। इनकी सींग नीचे की तरफ़ लटकती रहती है तथा रंग भूरापन लिए होता है। इस समय पूरे भारत में इन्हीं दो नस्लों की भैंस पाली जाती है तथा दुग्ध व्यवसाय में सर्वाधिक योगदान इन्हीं का है।     

बकरी को गरीबों की गाय कहा जाता है। इनको बहुत कम जगह में और कम खर्चे में पाला जा सकता है। इनको दूध और मांस दोनों के लिए पाला जाता है। दूध देने वाली बकरी की प्रमुख प्रजाति जमुनापारी है जो 2 से 3 लीटर दूध आसानी से देती है। बकरी की अन्य प्रजातियां बरबरी, बीटल, सुरती आदि हैं। बकरी का दूध अत्यधिक औषधीय महत्व रखता है। इसके दूध में आयरन की मात्रा सर्वाधिक होती है। इसके अलावा इसमें अन्य महत्वपूर्ण खनिज लवण और तत्व पाए जाते हैं। इनका दूध तीक्ष्ण गंध और स्वाद से बक बका होने के बावजूद औषधीय गुणों के कारण बहुत महत्व रखता है। इसके अलावा भेड़ और ऊंटनी से भी दूध प्राप्त किया जा सकता है। 

आत्मनिर्भर आर्थिक पैकेज में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पशुपालन व्यवसाय के आधारभूत ढांचे में सुधार के लिए 15 हज़ार करोड़ रुपये का प्रावधान। एनिमल हसबैंड्री इंफ़्रास्ट्रचक्टर डेवलपमेंट फ़ंड के ज़रिए पैकेज का ऐलान।

पशुपालन के लिए ध्यान देने योग्य सबसे महत्वपूर्ण यह है की पशु चयन में पूरी सतर्कता बरती जाए। अच्छे नस्ल के दुधारू पशुओं का चयन करने के लिए किसी जानकार व्यक्ति या पशु चिकित्सक की मदद लेनी चाहिए। पशुओं के लिए हरे चारे,दाना, सूखा चारा और इसके साथ साथ स्वच्छ जल की पर्याप्त उपलब्धता होनी चाहिए। पशुओं को समय-समय पर सभी प्रकार के टीके लगवाना चाहिए जिससे पशुओं को खुर पका,मुंह पका, एंथ्रेक्स जैसे गंभीर रोगों से बचाया जा सके। समय-समय पर चिकित्सक की सलाह लेना चाहिए। पशुओं का बीमा करवाने से जोखिम सुरक्षा रहती है। पशुशाला खुली जगह और हवादार होनी चाहिए। इसमें पर्याप्त साफ सफाई और उचित प्रबंधन होना चाहिए। प्रत्येक पशु के लिए लगभग 6 वर्ग फीट जगह अनिवार्य है। पशुपालन से पहले अपने क्षेत्र में सर्वेक्षण करना चाहिए कि लोग किस पशु अर्थात गाय या भैंस का दूध अधिक पसंद करते हैं। वहां से बाजार कितनी दूर है। दूध से बने दूसरे उत्पादों जैसे देसी घी, दही, लस्सी, छेना,पनीर, चीज आदि को कहां बेचा जा सकता है। इसके अलावा यह भी देखना चाहिए की अपने परिवेश में किस जानवर को पालना सबसे अधिक लाभदायक हो सकता है।      आजकल एबीएस सीमेन उपलब्ध है। इसका उपयोग करने से गायों को केवल कटड़ी अर्थात बछिया पैदा होने की संभावना 90% से अधिक होती है। इससे पशुपालकों को लाभ होगा। किसी संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करके पशुपालन को करना अधिक लाभदायक हो सकता है। यदि आप चाहें तो अपने डेरी में गाय, भैंस और बकरी तीनों को साथ-साथ पाल सकते हैं। इससे यह लाभ होगा की उपभोक्ता की मांग के अनुसार आप उत्पाद दे पाएंगे। इसके साथ साथ यदि आप इनके गोबर से, गोबर गैस प्लांट लगाते हैं तो आपको ऊर्जा की प्राप्ति भी होगी। इनके गोबर से बनी खाद के द्वारा ना केवल उपज बेहतर होगी बल्कि वर्तमान समय में विषैले हो रहे खाद्य पदार्थों तथा बंजर हो रही भूमि से भी बचाव होगा।  पशुपालन और कृषि का गठजोड़ ग्रामीण क्षेत्र के लिए वरदान साबित हो सकता है।

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