दुशवारियों के बीच आत्मनिर्भरता की राह पर भारत।

आत्मनिर्भर बनने के लिए बाजार की मौजूदा चुनौतियों व प्रतिस्पर्धा पर प्रकाश डाल रहे हैं सौरभ पाठक।

सौरभ पाठक
(लेखक पत्रकार, साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं।)

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना काल में गिरती भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए देशवासियों को आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम करने का आहवान किया है। सभी बेरोजगार युवाओं, श्रमिकों, मजदूरों, रेड़ी चालकों, ठेला कामगारों को आत्मनिर्भर बनना होगा, स्वदेशी को अपनाना होगा, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करना होगा, ये पहल वास्तव में अपने भारत के लिए अहम् है और कारगर भी सिद्व होगी। स्वदेशी वस्तुओं को अपनाओ, विदेशी का त्याग करो, के आन्दोलन कई बार भारत में जोर पकड़े पर अंततः इस प्रकार की उठी कई बार की पहलें धराशायी होती रही हैं। सन 1995 के दौर में भी स्वदेशी अपनाओ की आवाजें देश के कई अलग अलग हिस्सों से आने लगी थी। ऐसे ही स्वामी रामदेव के स्वदेशी आन्दोलन ने तेज गति से रफ्तार तय की, इस तरह के आन्दोलनों ने जोर तो पकड़ा, जनता ने भी खूब सहयोग, सराहना की, किन्तु चरम की यात्रा करते करते ये स्वदेशी की पहल पूर्णता से पहले ही कमजोर पड़ती गई।

आज एक बार पुनः नरेन्द्र मोदीजी के नेतृत्व में आत्मनिर्भरता के रास्ते से स्वदेशी अपनाओ की पहल शुरु होने जा रही है। देश की जनता अपने पीएम मोदी पर विश्वास कर भी ले और स्वरोजगारी की दिशा में कदम आगे बढ़ भी जाए और लोकल वोकल के उत्पादों का उत्पादन कर भी ले, किन्तु देश के प्रधानमंत्री को भी भारतीयों से एक वादा करना होगा कि वे वैश्विक स्तर पर देशों के बीच होने वाले समझौतों में अन्य देशों को भारत में व्यवसाय करने के लिए न्योता नही देगें और यदि बाह्य कम्पनियों को अवसर दिया भी जाता है तो भारत के आत्मनिर्भर वीरों का ख्याल रखा जाए। कहीं अनदेखी में वे आत्मनिर्भर राही आत्मबोझी न हो जाएँ, यदि अंतर्राष्ट्रीय व्यवसायिक समझौतों में बाह्य देशों को व्यापार करने का मौका मिलता है तो स्वदेशी अपनाओ, आत्मनिर्भर बनो, उत्पादन करो और स्वरोजगार सर्जन करो कि नीति और दिशा को बड़ा धक्का लगेगा क्योंकि जब बड़े व्यापारी संगठन उत्पादों का प्रचार प्रसार नई तकनीकी व विशेषताओं के साथ बाजार में उतरेंगे तो छोटे, मझौले व स्वदेशी उत्पाद बाजार में ज्यादा समय तक ग्लोबल, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के आकर्षक, बहुगुणी व चमक दमक के आगोश की प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पायेंगे। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की क्षमता व प्रतिस्पर्धा का सामना लोकल वोकल उत्पादकों से कराना तो बस एक छलावा ही होगा। यदि सरकार वास्तव में देश को स्वराज से स्वदेशी और आत्मनिर्भर बनाना चाहती है तो वैश्विक स्तर पर व्यापारिक नीतियों मेें बड़ा बदलाव करना होगा। वरना आत्मनिर्भर, स्वदेशी, स्वरोजगार की कल्पना मात्र एक दिखावे से अधिक कुछ भी नहीं होगी।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *