मुरादाबाद। स्कूल, काॅलिज एवं कार्यालयों में भाषण प्रतियोगिताओं एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कर राष्ट्रीय हिंदी दिवस मनाया गया । आज आवश्यकता केवल हिंदी दिवस मनाने, भाषण देने और हिंदी सप्ताह आयोजित करने की नहीं है । आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का वास्तविक उपयोग शासन, शिक्षा, न्याय और तकनीक में बढ़े।
हिंदी दिवस का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब हिंदी केवल समारोहों और सरकारी विज्ञप्तियों की भाषा न रहकर आम नागरिक के शासन, शिक्षा, न्याय और रोजमर्रा के जीवन में सहज रूप से दिखाई दे ।
स्वतन्त्रता के पश्चात 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। स्वतंत्रता के बाद देश को एक सूत्र में बांधने के लिए एक आधिकारिक भाषा की जरूरत थी, जिसके तहत हिंदी को यह महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अंतर्गत संघ की राजभाषा हिंदी और उसकी लिपि देवनागरी तय की गई।
इस ऐतिहासिक दिन की याद में वर्ष 1953 से देश भर में 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। उ.प्र.राज्य शिक्षक एवं शिक्षाविद पं.राधेश्याम शर्मा ने बताया कि यह दिन हमारी भाषाई एकता, संस्कृति और मातृभाषा के प्रति सम्मान प्रकट करने का है। भारत की सांस्कृतिक चेतना में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ने वाली संपर्क और अभिव्यक्ति की भाषा के रूप में हिंदी का व्यापक विस्तार हुआ है।
हिंदी के पक्ष में खड़े होने का अर्थ अंग्रेजी का विरोध करना नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि शासन और जनता के बीच भाषा की दूरी कितनी कम की जा सकती है। यदि सरकारी आदेश, प्रशासनिक प्रक्रियाएं, प्रतियोगी परीक्षाएं, उच्च शिक्षा और न्यायिक व्यवस्था ऐसी भाषा में संचालित हों जिसे आम नागरिक सहजता से समझ सके, तो लोकतंत्र की भागीदारी और मजबूत हो सकती है।


