आज के दौर में राजनीतिक रोटियां सेकने और समाज को बांटने के लिए कुछ दलों और विचारधाराओं द्वारा “ब्राह्मण चोर हैं”, “ब्राह्मण से वैश्या भली” या “तिलक तराजू और तलवार” जैसे ओछे और आहत करने वाले नारे गढ़े जाते हैं। ऐसी घृणा फैलाने वाली टिप्पणियों को पढ़कर किसी भी संवेदनशील मन को कष्ट होना स्वाभाविक है। लेकिन क्या कभी किसी ने ठंडे दिमाग से सोचा है कि बिना ब्राह्मण और उसके द्वारा बनाई सनातन व्यवस्था के हिंदू समाज का अस्तित्व क्या होगा?
संत कबीरदास जी ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा था:
“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोइ।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोइ।।”
दूसरों पर उंगली उठाने और समाज में कटुता फैलाने के बजाय यदि हम तथ्यों, विज्ञान और अर्थशास्त्र की कसौटी पर परखें, तो ब्राह्मणों द्वारा संरक्षित सनातन संस्कृति का सत्य कुछ और ही कहानी बयां करता है।
इतिहास गवाह है कि जब-जब भारत पर विदेशी आक्रांताओं के हमले हुए, जब-जब हमारे विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों को जलाकर राख कर दिया गया, तब-तब ब्राह्मणों ने अपनी स्मृति (याददाश्त) में वेदों, उपनिषदों और पुराणों को जीवित रखा। उन्होंने घोर भौतिक अभावों में रहकर भी, बिना किसी स्वार्थ के, मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस अद्भुत ज्ञान को आगे बढ़ाया।
ऋषि-मुनियों की इस धरती पर ब्राह्मणों का योगदान केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रहा है,
ज्ञान और विज्ञान में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। खगोल विज्ञान में आर्यभट्ट, अर्थशास्त्र व राजनीति में चाणक्य, और व्याकरण में पाणिनी जैसे मनीषियों ने पूरे विश्व को दिशा दिखाई।
वहीं बिखरती सांस्कृतिक एकता को मजबूती दी आदि शंकराचार्य ने, उन्होंने देश के चारों कोनों में पीठों की स्थापना कर भारत को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया, जिसके बिना आज हिंदू समाज पूरी तरह बिखर चुका होता।
सनातन धर्म की रीतियां केवल अंधविश्वास या मन बहलाव नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे गहरा विज्ञान और एक सुदृढ़ आर्थिक चक्र काम करता है।
आरती, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार का विज्ञान समझते हैं, मंदिरों के कांसे के घंटों से निकलने वाली ध्वनि (जो 7 सेकंड तक गूंजती है) मस्तिष्क के दोनों हिस्सों को संतुलित करती है और वातावरण से हानिकारक बैक्टीरिया नष्ट करती है। संस्कृत मंत्रों के कंपन से शरीर के चक्र जाग्रत होते हैं और मानसिक तनाव दूर होता है।
इसका आर्थिक लाभ भी है, इस दैनिक पूजा के लिए कपूर, अगरबत्ती, धूप, शुद्ध घी, पीतल और कांसे मिट्टी के बर्तनों की आवश्यकता होती है। इससे इन सामग्रियों को बनाने वाले लाखों छोटे कारीगरों और गृह-उद्योगों को दैनिक रोजगार मिलता है।
ऐसे ही 16 संस्कारों का महत्व का भी महत्व है। जन्म, मुंडन, यज्ञोपवीत से लेकर विवाह और श्राद्ध तक, हिंदू जीवन चक्र 16 संस्कारों से बंधा है। मुंडन से सिर की गर्मी शांत होती है और बौद्धिक विकास होता है, तो विवाह संस्कार समाज को मनोवैज्ञानिक स्थिरता देता है।
इसमें एक विशाल बाजार चक्र है, भारत में धार्मिक संस्कार और शादियां अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े प्रेरक हैं। एक अनुष्ठान या विवाह से वस्त्र उद्योग (साड़ी, धोती), आभूषण (सोना-चांदी), टेंट, कैटरिंग, फूल विक्रेता, मूर्तिकार और नाई जैसे दर्जनों व्यवसायों में पैसा घूमता है। यह धन का बहुत बड़ा सामाजिक पुनर्वितरण है।
वैसे ही मंदिर मात्र आस्था नहीं, आर्थिक उन्नति के महाकेंद्र हैं, भारत के प्राचीन और आधुनिक मंदिर देश की अर्थव्यवस्था के ‘इकोनॉमिक हब’ हैं। वे किस प्रकार आर्थिक उन्नति के केंद्र हैं, इसे समझना भी जरूरी है, पर्यटन और सेवा क्षेत्र में उपस्थिति, जब एक श्रद्धालु तिरुपति, वैष्णो देवी, काशी विश्वनाथ या केदारनाथ जाता है, तो उसके माध्यम से रेलवे, बस, टैक्सी चालक, होटल उद्योग, रेस्टोरेंट और स्थानीय गाइडों की आजीविका चलती है।
इससे रोजगार सृजन होता है, सफाईकर्मी, सुरक्षाकर्मी, रसोइए, माली, प्रबंधन के लोग और बुनकर लाखों परिवारों का चूल्हा सीधे तौर पर मंदिरों के प्रबंधन से जलता है।
और भी विशेष कि धन का सामाजिक कल्याण में उपयोग है, मंदिरों में आने वाला दान ट्रस्टों के माध्यम से समाज के कल्याण में वापस आता है। बड़े-बड़े अस्पताल, विश्वविद्यालय, स्कूल, अनाथालय और मुफ्त भोजन (लंगर/भंडारे) की व्यवस्था इन्हीं के द्वारा संचालित होती है।
सर्वसमावेशी आर्थिक चक्र को भी समझना आवश्यक है अर्थात समस्त हिंदू जातियों और मुस्लिम समाज को लाभ होता है, इस व्यवस्था की सबसे उत्तम बात यह है कि जब मंदिर में पूजा प्रारंभ होती है, तो उसका आर्थिक लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग और मजहब तक पहुंचता है।
मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हार भाई (प्रजापति समाज), पंडाल बनाने वाले कारीगर, वस्त्र तैयार करने वाले बुनकर और फूलों की खेती करने वाले माली (सैनी समाज) जैसे हर वर्ग को इससे सीधा रोजगार मिलता है। हिंदू समाज की प्रत्येक जाति इस धार्मिक अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य स्तंभ है। भारत के कई ऐसे पारंपरिक उद्योग हैं जो पूरी तरह हिंदू त्योहारों और मंदिरों पर निर्भर हैं, और उनमें काम करने वाले अधिकांश लोग मुस्लिम समुदाय से हैं जैसे बनारसी साड़ी का उद्योग, हिंदू शादियों में अनिवार्य मानी जाने वाली बनारसी साड़ियों को बुनने और उन पर जरी का काम करने वाले 80% से अधिक कारीगर मुस्लिम समाज से हैं। हिंदू महिलाओं के सोलह श्रृंगार के लिए कांच और लाख की चूड़ियाँ बनाने वाले (फिरोजाबाद व जयपुर में) मुख्य रूप से मुस्लिम कारीगर हैं। हिंदुओं के हर अनुष्ठान में बांधा जाने वाला पवित्र लाल धागा (कलावा/मौली) भी बड़े पैमाने पर मुस्लिम परिवारों द्वारा तैयार किया जाता है। मंदिरों के घंटे, पूजा की थाली, दीये और भगवान की मूर्तियां बनाने वाले कारखानों (जैसे मुरादाबाद और अलीगढ़) में ढलाई और नक्काशी का काम करने वाले कुशल कारीगरों में मुस्लिम समाज की बहुत बड़ी हिस्सेदारी है और इस लाभकारी योजना के रचनाकार ब्राह्मण ही हैं।
बराबरी करो इसमें बुराई नहीं है, लेकिन तप और परिश्रम से सबके हितों को मन में रखकर।
सनातन धर्म की यह व्यवस्था ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सिद्धांत को आर्थिक धरातल पर सच साबित करती है। जब एक सच्चा ब्राह्मण चंदन का तिलक लगाकर, शिखा बांधकर, धोती-कुर्ता पहनकर निकलता है, तो वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस महान वैज्ञानिक और समावेशी संस्कृति का संवाहक होता है।
जब मंदिर में घंटा बजता है, तो उससे पैदा होने वाला धन किसी एक जाति या धर्म की जेब में नहीं जाता, बल्कि वह समाज के हर वर्ग, हर मजहब के चूल्हे को रोशन करता है। इसलिए, समाज को तोड़ने वाले बयानों और नफरत के बजाय इस व्यवस्था के महत्व को समझें। यदि किसी को आपत्ति है, तो वह ज्ञान, तप, त्याग और सदाचार में ब्राह्मणों की बराबरी करने का प्रयास करे, न कि समाज में कटुता फैलाकर उनकी बुराई करे। बिना ब्राह्मण के त्याग और मार्गदर्शन के सनातन धर्म की कल्पना वैसी ही है जैसे बिना आत्मा के शरीर।


