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    Home » आंदोलन जनता की आवाज़ या राजनीति का हथियार?

    आंदोलन जनता की आवाज़ या राजनीति का हथियार?

    P.K. RastogiBy P.K. RastogiAugust 17, 2026

    •दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड की सड़कों तक बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच सबसे बड़ा सवाल- आंदोलनकारी की आवाज आखिर कहाँ है?

    राजनीति की सबसे सुविधाजनक बात शायद यही है कि आंदोलन का श्रेय कोई नहीं लेना चाहता, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ उठाने में कोई पीछे नहीं रहता। सत्ता में बैठे लोग आंदोलन को विपक्ष की साजिश बताते हैं, जबकि विपक्ष उसे जनता की आवाज कहता है। सत्ता बदलते ही बयान बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं और कई बार उसी आंदोलन को देखने का नजरिया भी बदल जाता है।

    लेकिन इस पूरी राजनीतिक बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति अक्सर वही रह जाता है, जिसकी आवाज से आंदोलन शुरू हुआ था-आंदोलनकारी।

    सवाल केवल यह नहीं है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र क्यों उतरे, झारखंड में छात्र क्यों सड़क पर आए या किस राजनीतिक दल ने किस आंदोलन का समर्थन किया। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है- क्या आंदोलन जनता की आवाज हैं या राजनीति के लिए उपलब्ध सबसे प्रभावी हथियार?

    आंदोलन की समस्या वास्तविक, राजनीति का इस्तेमाल अलग मुद्दा

    किसी आंदोलन में शामिल छात्रों की समस्या को केवल इसलिए झूठा नहीं कहा जा सकता क्योंकि बाद में कोई राजनीतिक दल उनके साथ खड़ा दिखाई देता है। छात्र की समस्या वास्तविक हो सकती है, उसकी पीड़ा वास्तविक हो सकती है और उसकी मांग भी जायज हो सकती है।लेकिन समस्या के वास्तविक होने का अर्थ यह नहीं कि उसके आसपास की राजनीति भी अनुपस्थित है।

    जनता के भीतर असंतोष पैदा हो सकता है, लेकिन उस असंतोष को कितना समर्थन मिलेगा, कौन उसे मंच देगा, कौन उसे मीडिया तक पहुंचाएगा, कौन उसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाएगा और कौन उससे राजनीतिक लाभ उठाएगा- ये अलग-अलग सवाल हैं। आंदोलन की ईमानदारी और उसके राजनीतिक इस्तेमाल की संभावना एक ही चीज नहीं हैं।

    दिल्ली से झारखंड तक बदल गए राजनीतिक किरदार

    दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन इसी जटिलता को सामने लाता है। छात्रों की सक्रियता से शुरू हुआ मुद्दा धीरे-धीरे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। बाद में सामाजिक एवं राजनीतिक चेहरों की मौजूदगी ने आंदोलन को और व्यापक चर्चा दिलाई।

    जब आंदोलन भाजपा सरकार के सामने था, तब विपक्ष उसके साथ दिखाई दिया और भाजपा की ओर से आंदोलन के पीछे राजनीतिक भूमिका होने के आरोप लगाए गए। विपक्ष ने इन आरोपों को खारिज किया।

    फिर झारखंड का उदाहरण सामने आया, जहां सत्ता का समीकरण बिल्कुल अलग है। वहां जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों को लेकर छात्र आंदोलनरत हैं। सरकार और छात्रों के बीच बातचीत हुई, लेकिन मांगों के समाधान को लेकर आंदोलन जारी रखने की बात भी सामने आई।

    वहीं भाजपा ने सरकार पर आंदोलनकारियों को दबाने के आरोप लगाए, जबकि सरकार की ओर से भाजपा पर छात्रों को राजनीतिक लाभ के लिए गुमराह करने के आरोप लगाए गए।

    यानी दिल्ली में समीकरण था- भाजपा सत्ता में, विपक्ष आंदोलन के साथ।

    झारखंड में समीकरण है- हेमंत सोरेन सरकार सत्ता में और भाजपा विपक्ष में।

    किरदार बदल गए, राजनीतिक बयान बदल गए और आंदोलन को देखने की भाषा भी बदल गई।

    सत्ता बदलते ही आंदोलन की परिभाषा क्यों बदल जाती है?

    यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि दिल्ली में आंदोलनकारी पर कार्रवाई लोकतंत्र पर हमला थी, तो झारखंड में वैसी कार्रवाई कानून-व्यवस्था का प्रश्न कैसे बन सकती है? और यदि झारखंड में छात्र अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरकर लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो दिल्ली में छात्रों की मांग को राजनीतिक साजिश बताने की जरूरत क्यों पड़ी?

    यदि लाठी आंदोलनकारी पर पड़े तो उसका अर्थ सत्ता बदलते ही क्यों बदल जाता है?

    यह सवाल किसी एक पार्टी के खिलाफ नहीं है। यह उस राजनीतिक दोहरेपन के खिलाफ है, जिसमें सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है और विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज बन जाता है।

    सत्ता आंदोलन को विपक्ष की साजिश बताकर कमजोर करना चाहती है, जबकि विपक्ष उसी आंदोलन को जनता की आवाज बताकर सत्ता पर हमला करता है। इस राजनीतिक खींचतान के बीच आंदोलनकारी की मूल समस्या अक्सर पीछे छूट जाती है।

    प्रमाण के बिना आरोप नहीं, लेकिन सवाल जरूरी

    क्या इसका अर्थ यह है कि दिल्ली के पीछे विपक्ष था या झारखंड के पीछे भाजपा है? नहीं।

    बिना प्रमाण के ऐसा निष्कर्ष निकालना पत्रकारिता नहीं होगा। लेकिन इन सवालों को पूछना भी बंद कर देना निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है।

    राजनीति अपने हाथ के निशान छोड़कर आंदोलन नहीं करती। कोई राजनीतिक दल खुले मंच से यह घोषणा नहीं करता कि आंदोलन हमने करवाया है। इसलिए पत्रकार का काम किसी अदृश्य हाथ की कहानी गढ़ना नहीं, बल्कि घटनाओं का क्रम देखना, राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को समझना, हितों को पहचानना और यह पूछना है कि आखिर राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है? क्योंकि पैटर्न प्रमाण नहीं होता, लेकिन पैटर्न देखकर सवाल पूछना भी अपराध नहीं है।

    आंदोलन से राजनीतिक लाभ किसे?

    सवाल यह होना चाहिए कि आंदोलन से राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है? किसे राष्ट्रीय चर्चा मिल रही है? किसे सत्ता पर हमला करने का अवसर मिल रहा है? किसकी राजनीतिक जमीन मजबूत हो रही है? कौन-सा मुद्दा लगातार चर्चा में रहकर दूसरे मुद्दों को पीछे धकेल रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण- क्या राजनीतिक दलों का लक्ष्य वास्तव में समस्या का समाधान है या समस्या से पैदा होने वाली राजनीतिक ऊर्जा का इस्तेमाल? यहीं से यह बहस भविष्य की राजनीति से भी जुड़ती है।

    2029 में लोकसभा चुनाव होने हैं। यदि विपक्ष यह मानता है कि छात्रों, शिक्षा और दूसरे जनमुद्दों से जुड़े आंदोलनों को लगातार राजनीतिक ऊर्जा देकर भाजपा के खिलाफ माहौल तैयार किया जा सकता है, तो यह रणनीति उलटी भी पड़ सकती है। क्योंकि आंदोलन को जिंदा रखना और समस्या को जिंदा रखना एक बात नहीं है।

    सरकार के पास भी है समाधान का अवसर

    आज जिस समस्या को लेकर छात्र सड़क पर हैं, जरूरी नहीं कि 2029 में भी वही समस्या उसी तीव्रता से मौजूद रहे। सरकार परीक्षा व्यवस्था में सुधार कर सकती है, भर्ती प्रक्रिया में बदलाव कर सकती है, युवाओं के लिए नई योजनाएं ला सकती है और आज जिस मुद्दे पर वह कठघरे में है, वही कल उसकी उपलब्धि बन सकता है।राजनीति में सबसे बड़ा जोखिम यही है कि विपक्ष जिस मुद्दे को सरकार की कमजोरी समझकर लगातार उठाता रहे, सरकार उसी मुद्दे पर समाधान देकर उसे अपनी उपलब्धि में बदल दे। इसलिए लंबा आंदोलन हमेशा बड़ा आंदोलन नहीं होता।

    कई बार आंदोलन जितना लंबा चलता है, उतना ही सामान्य होता जाता है। मीडिया का ध्यान दूसरे मुद्दों की ओर चला जाता है, जनता की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और कभी राष्ट्रीय संकट जैसा दिखाई देने वाला मुद्दा राजनीतिक शोर में दब जाता है।

    छात्र महत्वपूर्ण हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं

    विपक्ष के सामने एक और चुनौती है। भारत को केवल शिक्षा के मुद्दे पर वर्षों तक एक सूत्र में बांधना आसान नहीं है। देश में बेरोजगारी, महंगाई, किसान, स्वास्थ्य, रोजगार, स्थानीय भ्रष्टाचार, विस्थापन जैसे अनेक मुद्दे हैं। छात्र समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरा समाज नहीं। इसलिए यह मान लेना कि किसी एक छात्र आंदोलन की निरंतरता स्वतः राष्ट्रीय सत्ता-विरोधी आंदोलन में बदल जाएगी, भारतीय समाज की विविधता को कम करके आंकना होगा।

    आंदोलन लोकतंत्र का अलार्म है

    लेकिन इन सभी राजनीतिक समीकरणों के बीच आंदोलन को दोष देना भी उचित नहीं होगा।आंदोलन लोकतंत्र की बीमारी नहीं, लोकतंत्र का अलार्म है।

    जब संस्थाएं जनता की बात सुनती हैं तो सड़क पर उतरने की जरूरत कम होती है। जब व्यवस्था सुनना बंद करती है तो सड़क बोलती है।इसलिए असली सवाल यह नहीं कि छात्र आंदोलन क्यों कर रहे हैं। असली सवाल यह है—

    उन्हें अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?

    यदि सरकार आंदोलन खत्म करने के लिए समस्या का समाधान करती है तो आंदोलन लोकतंत्र की सफलता है। लेकिन यदि विपक्ष आंदोलन को केवल सत्ता गिराने की सीढ़ी और सत्ता आंदोलन को केवल विपक्ष की साजिश बताने का हथियार मानती है, तो दोनों ही परिस्थितियों में आंदोलनकारी की समस्या पीछे चली जाती है।

    जनता को राजनीतिक समर्थन नहीं, समाधान चाहिए

    जनता को न भाजपा का आंदोलन चाहिए, न कांग्रेस का और न किसी अन्य दल का। जनता को अपनी समस्या का समाधान चाहिए। राजनीतिक दलों के लिए आंदोलन सत्ता के समीकरण का हिस्सा हो सकता है, लेकिन आंदोलनकारी के लिए वह उसकी जिंदगी, भविष्य, परीक्षा, नौकरी और सम्मान का सवाल हो सकता है। यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि दिल्ली के आंदोलन के पीछे कौन था और झारखंड के आंदोलन के पीछे कौन है। असली सवाल यह है— जब जनता सड़क पर उतरती है तो राजनीतिक दल उसके साथ इसलिए खड़े होते हैं क्योंकि उन्हें जनता की समस्या दिखाई देती है, या इसलिए क्योंकि उन्हें सत्ता में बैठे अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी दिखाई देती है?

    आंदोलन की असली जीत क्या है?

    इस सवाल का उत्तर शायद किसी राजनीतिक दल के बयान में नहीं मिलेगा। सत्ता अपनी मजबूरी बताएगी, विपक्ष अपनी नैतिकता बताएगा और आंदोलनकारी अपनी मांग। लेकिन इतिहास इन तीनों से आगे जाकर यह पूछेगा कि आखिर उस आंदोलन ने हासिल क्या किया और किसके लिए किया। क्योंकि राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है— सत्ता में रहते हुए आंदोलन समस्या दिखाई देता है और विपक्ष में रहते हुए वही आंदोलन लोकतंत्र की आवाज बन जाता है। और यदि यही राजनीति का नियम बन गया है तो आंदोलनकारी नहीं बदल रहे।

    सिर्फ उनके पीछे खड़े होने वाले चेहरे बदल रहे हैं।

    आंदोलन का मालिक कोई नहीं बनता, लेकिन उसके राजनीतिक लाभ का उत्तराधिकारी बनने के लिए हर कोई तैयार रहता है। सत्ता कहती है- यह विपक्ष की साजिश है। विपक्ष कहता है- यह जनता की आवाज है।

    और जनता? वह उसी सड़क पर खड़ी रहती है, अपनी वही मांग लेकर, अगली सरकार का इंतजार करती हुई। इसलिए लोकतंत्र के सामने अंतिम सवाल यह नहीं कि आंदोलन किसने शुरू किया। असली सवाल यह है कि आंदोलन खत्म होने के बाद उसकी मांग किसने पूरी की।क्योंकि आंदोलन की सबसे बड़ी जीत सरकार का झुकना नहीं है। उसकी सबसे बड़ी जीत तब होगी, जब अगली पीढ़ी को उसी मांग के लिए फिर सड़क पर न उतरना पड़े। और अगर हर पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी की वही मांग लेकर सड़क पर उतरना पड़ रहा है, तो सवाल केवल सरकार से नहीं है।

    सवाल उस पूरी राजनीति से है, जो हर आंदोलन में जनता को कम और अपना अगला चुनाव ज्यादा देखती है।

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    पवन कुमार रस्तोगी पिछले पाँच वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में न्यूज़ पोर्टल में एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने एम.ए., बीएड, पत्रकारिता तथा एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर क्षेत्र में एडीसीए तथा कला के क्षेत्र में बॉम्बे आर्ट जैसे पाठ्यक्रम भी पूर्ण किए हैं। समाचार लेखन, संपादन, जनसरोकार से जुड़े विषयों और डिजिटल पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है। निष्पक्ष, तथ्यपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। वे सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं जनहित से जुड़े मुद्दों को सरल, सटीक और विश्वसनीय ढंग से पाठकों तक पहुँचाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

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