•आशूरा के अवसर पर कहा— राम की मर्यादा, अली का न्याय और हुसैन का साहस ही मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता।
विशेष संवाददाता।
आशूरा के उपरांत अपने संदेश में स्वामी सारग जी महाराज ने कहा कि कर्बला केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि सत्य, न्याय, करुणा और मानव गरिमा की रक्षा का शाश्वत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि हजरत अली और इमाम हुसैन को किसी एक धर्म, संप्रदाय या भूगोल तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उनका जीवन संपूर्ण मानवता के लिए प्रेरणास्रोत है।
उन्होंने कहा कि एक मासूम बच्चे के प्रश्न—”हुसैन कौन थे और अली कौन थे?”—का उत्तर केवल नामों या इतिहास से नहीं दिया जा सकता। अली और हुसैन न्याय, सत्य, करुणा, मर्यादा और आत्मबलिदान के ऐसे आदर्श हैं, जिनकी आवश्यकता हर युग को रहती है। वहीं यज़ीद केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस विचार का प्रतीक है जो सत्ता को सत्य से ऊपर और भय को न्याय से बड़ा मानता है।
स्वामी सारग जी महाराज ने कहा कि कर्बला चौदह सौ वर्ष पुरानी घटना नहीं है, बल्कि जब-जब सत्ता सत्य से टकराती है, अन्याय इंसानियत पर भारी पड़ता है और मौन अत्याचार का साथ देता है, तब-तब कर्बला जीवंत हो उठती है।
उन्होंने कहा कि कुछ लोग यह प्रश्न करते हैं कि “दोनों मुसलमान थे, फिर इससे हमारा क्या संबंध?” इसका उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि कर्बला किसी धर्म विशेष का विषय नहीं, बल्कि दो विचारधाराओं का संघर्ष था। जिस प्रकार भगवान श्रीराम और रावण के बीच अंतर पूजा-पद्धति का नहीं, बल्कि मर्यादा और अहंकार का था, उसी प्रकार इमाम हुसैन और यज़ीद के बीच भी संघर्ष सिद्धांत और स्वार्थ, ईमान और सत्ता का था।
उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि समाज ने इतिहास के महान नैतिक आदर्शों को संकीर्ण दायरों में बांट दिया है। श्रीराम को केवल एक धर्म तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका जीवन संपूर्ण मानवता के लिए मर्यादा का आदर्श है। इसी प्रकार हजरत अली और इमाम हुसैन को भी संप्रदायों की सीमाओं में बांध दिया गया, जबकि उनका संदेश हर उस व्यक्ति के लिए है जो सत्य, न्याय और करुणा में विश्वास रखता है।
स्वामी सारग जी महाराज ने कहा कि आज दुनिया को किसी नए संघर्ष की नहीं, बल्कि श्रीराम की मर्यादा, हजरत अली के न्याय और इमाम हुसैन के साहस की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि सच्चा वैश्विक समाज तभी बन सकता है, जब हम व्यक्तियों की नहीं, उनके मूल्यों की विरासत को अपनाएं।
उन्होंने अपने संदेश के अंत में कहा कि आशूरा यह नहीं पूछता कि मनुष्य किस धर्म में जन्मा है, बल्कि यह प्रश्न छोड़ जाता है कि जब सत्य और सत्ता आमने-सामने हों, तब हम किसके साथ खड़े होंगे। यदि हम अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाते हैं तो हुसैन आज भी हमारे भीतर जीवित हैं। यही कर्बला की विरासत, हुसैन का पैगाम और मानवता की सबसे बड़ी उम्मीद है।