•श्रद्धांजलि सभा में छलके प्रेम और विरह के भाव, संतों ने कहा—बाबा के आदर्शों को जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि
बरसाना। ब्रज की रज जिनके लिए चंदन थी, गौवंश जिसकी करुणा का केंद्र था और श्रीराधा नाम जिनकी सांसों में बसा था, ऐसे ब्रजनिष्ठ, गौ निष्ठ और नाम निष्ठ संत रमेश बाबा महाराज का संपूर्ण जीवन प्रेम, त्याग, साधना और सेवा की अनुपम मिसाल रहा। उन्होंने भक्ति को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे ब्रजभूमि के संरक्षण, गोसेवा, प्रकृति के प्रति करुणा और जनसेवा का माध्यम बनाया। उनके गोलोकगमन के बाद आयोजित श्रद्धांजलि सभा में संतों और वक्ताओं के हृदय से निकले शब्दों में बाबा के प्रति अगाध प्रेम, उनके विछोह की पीड़ा और उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने का संकल्प स्पष्ट दिखाई दिया।

रविवार को बरसाना के समीप मानपुर स्थित माताजी गौशाला के पवित्र गोष्ठ में आयोजित श्रद्धांजलि सभा की अध्यक्षता निम्बार्क पीठाधीश्वर श्यामशरण देवाचार्य महाराज ने की। मान मंदिर के कार्यकारी अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री ने प्रस्तावना प्रस्तुत करते हुए संत रमेश बाबा महाराज की साधना, उनके व्यक्तित्व और ब्रज के प्रति उनके अनन्य समर्पण का भावपूर्ण स्मरण किया। संत गिरि बाबा ने उपस्थित संतों का स्वागत किया।
वृंदावन स्थित सुदामा कुटी (श्री नाभा पीठ) के पीठाधीश्वर स्वामी सुतीक्ष्ण दास देवाचार्य महाराज ने कहा कि रमेश बाबा महाराज का जीवन वैराग्य, भक्ति और सेवा की त्रिवेणी था। श्रीराधा रानी के प्रति उनकी अनन्य निष्ठा और संपूर्ण ब्रजमंडल के प्रति उनकी आत्मीयता उनके जीवन के प्रत्येक कार्य में दिखाई देती थी। उन्होंने ब्रज को केवल तीर्थभूमि नहीं, बल्कि अपने आराध्य की लीला स्थली और अपने जीवन का प्राण माना। ब्रज की पहाड़ियों, प्राचीन कुंडों, सरोवरों, वनों और उपवनों के संरक्षण के लिए उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।
चतुर संप्रदाय के पीठाधीश्वर फूलडोर बिहारी दास महाराज ने गौसेवा के क्षेत्र में बाबा के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि माताजी गौशाला के माध्यम से उन्होंने असंख्य गोवंश की सेवा का संकल्प साकार किया। उनके लिए गौसेवा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि करुणा, संवेदना और आराध्य के प्रति प्रेम की सहज अभिव्यक्ति थी। श्रीराधा नाम संकीर्तन और ब्रज यात्रा के माध्यम से उन्होंने अनगिनत लोगों को भक्ति की धारा से जोड़ा।
सभा में वक्ताओं ने कहा कि रमेश बाबा महाराज का ब्रजप्रेम केवल शब्दों और उपदेशों तक सीमित नहीं था। ब्रज की लताओं, वृक्षों, कुंडों, सरोवरों और वनभूमि से उनका गहरा आत्मीय संबंध था। ब्रजवासी उनके लिए अपने परिवार के समान थे। उनकी साधना में जहां श्रीराधा रानी के प्रति अनन्य प्रेम था, वहीं जीवमात्र के प्रति करुणा और प्रकृति के संरक्षण का भाव भी समाहित था। उनका जीवन संदेश देता है कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें आराध्य के प्रति प्रेम के साथ उनकी प्रिय भूमि, वहां के जीवों और समाज के प्रति सेवा का भाव भी हो।
संतों और अनुयायियों ने बाबा के सान्निध्य में बिताए क्षणों को याद करते हुए कहा कि उनके जाने से मान मंदिर और गहवर वन ही नहीं, बल्कि उन असंख्य हृदयों में भी एक रिक्तता उत्पन्न हुई है, जिन्होंने उनके स्नेह, मार्गदर्शन और भक्ति का अनुभव किया। उनके विछोह की पीड़ा के बीच यह विश्वास भी व्यक्त किया गया कि महापुरुष अपनी देह से भले ही विदा हो जाएं, लेकिन उनकी साधना, उनके संस्कार और उनके द्वारा स्थापित सेवा परंपराएं समाज को सदैव दिशा देती रहती हैं।
वक्ताओं ने कहा कि रमेश बाबा महाराज के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल उनके गुणों का स्मरण करने में नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने में है। यदि समाज श्रीराधा नाम के प्रति निष्ठा रखे, गोवंश की सेवा करे, ब्रज की प्राकृतिक और आध्यात्मिक धरोहर की रक्षा करे तथा जरूरतमंदों के प्रति करुणा का भाव अपनाए, तो यही बाबा के जीवन संदेश को आगे बढ़ाने का सार्थक माध्यम होगा। उनका जीवन सिखाता है कि त्याग से साधना पुष्ट होती है, करुणा से सेवा सार्थक होती है और प्रेम से मनुष्य का जीवन लोकमंगल के लिए समर्पित बनता है।
सभा का संचालन भक्त शरण महाराज ने किया। मान मंदिर के सचिव सुनील सिंह उर्फ ब्रजदास ने संतों, महात्माओं और श्रद्धालुओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर स्वामी हरिदास पीठाधीश्वर राधा प्रसाद देव महाराज, सुदामा कुटी बरसाना के रामरज दास, डॉ. रामजीलाल शास्त्री, नृसिंह दास महाराज, जूना अखाड़ा के महामंडलेश्वर नवल गिरि महाराज, मोहिनी बिहारी शरण, चंद्रमा दास महाराज, करुण दास महाराज, गोपेश बाबा, रमेश चंद गोस्वामी, लोकेश गोस्वामी, मृदुलकांत शास्त्री, रमाकांत गोस्वामी, भानुप्रताप सिंह, महावीर अग्रवाल, पूरन कौशिक, धीरज शास्त्री, राधाप्रिय दास, हिमानी चतुर्वेदी, राजन पाठक, पंकज चतुर्वेदी, केके अग्रवाल सहित अनेक संत, महात्मा, अनुयायी और श्रद्धालु उपस्थित रहे।i


