शादी की उम्र बढ़ाने पर उठे सवाल!

हर्षदेव की कलम से।

क्या लड़कियों की शादी की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल कर देने की पेशकश सही है? इस फैसले से क्या और किसको लाभ होगा? विचार इस पर भी करना चाहिए कि समाज पर उसका प्रभाव क्या और किस रूप में पड़ेगा! इन तमाम सवालों का जवाब सरकार की ओर से नियुक्त उस 10 सदस्यीय पैनल को देना है, जिसका जून महीने में गठन किया गया है। इस समय लड़कों के लिए विवाह की उम्र 21 और लड़कियों के लिए 18 साल तय है। सरकार की मंशा लड़कियों की आयु भी 21 साल करने की बताई जा रही है।
लड़कियों की शादी की उम्र में बदलाव के इरादे की पहली बार जानकारी स्वयं प्रधानमंत्री ने लालकिले से 15 अगस्त को अपने भाषण में दी थी। तब से इस विषय पर कुछ समाज शास्त्रियों की त्वरित टिप्पणियां आ चुकी हैं। इनमें से कुछ का कहना है कि यह कदम नौनिहालों की मृत्यु दर में कमी लाने के लिहाज से सही है जबकि कुछ अन्य इसको महिलाओं के स्वास्थ्य और आर्थिक बेहतरी के लिहाज से सार्थक बता रहे हैं। उनके अनुसार विवाह की आयु बढऩे से लड़कियों को पढऩे-लिखने और अपने व्यक्तित्व के विकास के लिए भरपूर समय मिल सकेगा।
इस विमर्श के साथ एक जरूरी प्रश्न यह भी है कि बाल विवाह के विरुद्ध सख्त कानूनी पाबन्दी के वाबजूद इतने बड़े पैमाने पर कच्ची उम्र में शादियां क्यों होती हैं! सरकार के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल औसतन 1.55 करोड़ बाल विवाह होते हैं जो विश्व में सबसे ज्यादा हैं। एक अध्ययन के अनुसार भारत में 27 प्रतिशत विवाह 18 वर्ष से पहले और 7 फीसदी 15 साल से कम आयु में कर दिए जाते हैं। कानूनी पाबन्दी के वाबजूद समाज द्वारा अपने ही बच्चों और किशोरों के साथ यह सामाजिक अत्याचार तथा उनके अधिकारों का हनन पीढ़ी-दर-पीढ़ी क्यों कर होता चला आ रहा है।समाज शास्त्रियों का कहना है कि नाबालिग उम्र में शादी की समस्या का सम्बन्ध परिवार के आर्थिक हालात और पुरुष की वर्चस्ववादी सोच से जुड़ा हुआ है। दूसरे शब्दों में बाल विवाह का पहला बड़ा कारण गरीबी और दूसरा दकियानूसी विचार हैं। आर्थिक तंगी से जूझते माता-पिता पढ़ाई का खर्च बचाने के लिए बच्चों और खासकर लड़कियों का स्कूल छुड़वा देते हैं। इसके पीछे घर और मजदूरी के काम में हाथ बंटाने का मकसद भी रहता है। कच्ची उम्र में शादी की ज्यादती लड़कियों के साथ अधिक होती है। इसका एक और कारण यौनाचार के बारे में पुंसवादी विचार और पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिलाओं की यौन स्वतंत्रता पर अंकुश रखने की जि़द है। गरीब माता-पिता दहेज़ में असमर्थ होने के कारण भी बच्चों खासतौर से लड़कियों की जल्दी शादी कर देते हैं।
बच्चों का बालपन, उनके जीवन की सहजता और व्यक्तित्व का विकास छीन लेने वाले बाल विवाह की बुराई को कानून, सामाजिक जागरूकता तथा शैक्षिक समझदारी के जरिये दूर करने का दायित्व सभी का है, लेकिन यहां उन संगठनों और समाज शास्त्रियों की बात पर भी विचार करना होगा जो महिलाओं की वैवाहिक आयु बढ़ाने के प्रस्ताव को अनुचित बता रहे हैं। यह परामर्श 100 से अधिक नागरिक संस्थाओं ने सरकार को दिया है। उन्होंने दावा किया है कि इस कदम से माताओं और शिशुओं की सेहत में सुधार लाने में खास मदद नहीं मिलेगी।
नागरिक अधिकारों से जुड़े संगठनों ने पूछा है कि शादी की न्यूनतम उम्र बढ़ाना एक कदम आगे रखना कैसे है क्योंकि यह अनेक महिलाओं को स्वेच्छा से विवाह करने का अधिकार देने से इनकार करता है। उन्होंने यह भी पूछा है कि यह उन परिवारों को अपराधी मानने में कैसे मदद करेगा, जिनके जिंदा रहने की जरूरतें एवं असुरक्षा न सिर्फ उन्हें जल्दी शादी करने/कराने और कम उम्र में रोजगार/नौकरी पर जाने के लिए मजबूर करती है। नागरिक संस्थाओं ने सरकार से विवाह की उम्र न बढ़ाने का आग्रह किया है। इन संस्थाओं का दावा है कि ‘यह लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकारों या लड़कियों के सशक्तीकरण को बढ़ावा नहीं देगा और मांओं एवं शिशुओं की सेहत को सुधारने में भी खास मददगार नहीं होगा। इन संस्थाओं ने कहा, ‘यह बहुत ही सतही समझ है कि महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए विवाह की उम्र 21 साल करना लैंगिक समानता का प्रतीक है। करीब 100 नागरिक संस्थाओं और 2,500 युवा आवाजों द्वारा समर्थित इस बयान में कहा गया, ‘अगर उम्र के लिहाज से कानूनी समानता को लागू करने की बात है तो इसे महिलाओं और पुरुषों दोनों के लिए 18 साल करने पर विचार करना ज्यादा सार्थक होगा, जैसा कि विश्व के ज्यादातर हिस्सों में है। इन्होंने कहा कि कानून के जरिए विवाह की उम्र बढ़ाना जल्दी शादी को रोकने की बजाय इसे आपराधिक बनाएगा। नागरिक संस्थाओं ने अनुशंसा की है कि विवाह की उम्र बढ़ाने की बजाय, सरकार को स्कूली व्यवस्था और रोजगार के अवसरों को मजबूत करने पर विचार करना चाहिए।
हमारे समाज की दकियानूसी समझ और पैतृक सत्ता की जि़द इतनी ज्यादा रही है कि बाल विवाह के खिलाफ 1929 में पहला कानून (शारदा अधिनियम) बनाने के समय कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं ने इस कदम को ‘हिंदुओं के सामाजिक रीति-रिवाजों’ में दखलंदाजी कहकर उसका सख्त विरोध किया था। हालांकि इस विरोध के वाबजूद यह कानून पारित हुआ। इसके अनुसार 18 साल से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष से छोटे लड़के की शादी को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया। कानून तोडऩे पर 15 दिन की कैद और एक हजार रुपये के आर्थिक दंड का प्रावधान किया गया। इस कानून में 1940 में मामूली सुधार किए गए, लेकिन 2006 में एक नया अनुच्छेद और जोड़ा गया कि बचपन में शादी हो जाने के बावजूद बालिग होने के दो साल के भीतर दम्पति में से कोई भी ऐसी शादी को नामंजूर कर सकता है।
समाज में व्यापक स्तर पर माना जाता है कि बाल विवाह भी एक कुप्रथा है। साथ ही कानूनी पाबंदियां जारी हैं, लेकिन पिछड़े परिवारों में आज भी बच्चों के अधिकारों का यह हनन यथावत चल रहा है। यह ऐसा अभिशाप है जो हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था पर बहुत ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसका लड़के और लड़की के अपने तथा भावी संतानों के स्वास्थ्य पर बेहद खऱाब असर पड़ता है। नवजातों की मृत्यु दर खासी ऊंची रहती है, बालिग होने से पहले ही मां बन जाने वाली लड़की की अकाल मृत्यु की आशंका प्रबल हो जाती है। इतना ही नहीं, दोनों की शिक्षा और व्यक्तित्व का विकास भी बीच में ही रुक जाते हैं।
एक स्वस्थ और विकसित समाज के लिए जरूरी है कि ऐसी बाल विरोधी प्रथाओं या परम्पराओं से मुक्ति के संगठित उपाय किए जाएं। इसमें स्वैच्छिक और गैर सरकारी संगठनों की भूमिका ज्यादा कारगर और सार्थक हो सकती है। जिस प्रकार बाल मजदूरी रोकने के लिए अनेक समाजसेवी संगठन सक्रिय और उपयोगी भूमिका निभा रहे हैं, उसी तरह का हस्तक्षेप बाल विवाह के मामले में भी किया जा सकता है। सभी को यह समझना होगा कि यह ऐसी सामाजिक बुराई है, जिसके दुष्प्रभाव बहुत दूरगामी और व्यापक हैं। इसलिए हर स्तर पर प्रयास करना होगा कि जागरूकता के जरिये इस अमानवीय रीति से भावी पीढिय़ों को मुक्त करने की दिशा में आगे बढ़ा जाए।

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