•अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में ‘मुद्रा एवं बंध’ के वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व पर हुआ मंथन
रिपोर्ट: एल०एम० पाण्डेय।
गोरखपुर। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर महायोगी गुरु गोरखनाथ योग संस्थान, गोरखनाथ मंदिर एवं महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद, गोरखपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित साप्ताहिक योग शिविर एवं शैक्षिक कार्यशाला के तीसरे दिन गोरखनाथ मंदिर स्थित महंत दिग्विजयनाथ स्मृति सभागार में ‘मुद्रा एवं बंध’ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की गई।
मुख्य वक्ता के रूप में योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, आयुष विभाग गोरखपुर के चिकित्सक तथा नाथयोग एवं नेचुरोपैथी सेंटर के निदेशक प्रसिद्ध योगाचार्य डॉ. जयन्त नाथ ने कहा कि महायोगी गुरु गोरखनाथ की हठयोग साधना में मुद्रा एवं बंध का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने कहा कि यौगिक मुद्राएँ चित्त को एकाग्र कर मन को प्रसन्नता प्रदान करती हैं। ये न केवल शरीर को निरोगी बनाती हैं, बल्कि आध्यात्मिक उन्नति का भी सशक्त माध्यम हैं।
उन्होंने बताया कि घेरण्ड संहिता के अनुसार खेचरी मुद्रा के अभ्यास से साधक जरा एवं मरण पर विजय प्राप्त कर सकता है। मुद्राओं के माध्यम से शरीर के भीतर होने वाली विभिन्न गतिविधियों को नियंत्रित किया जाता है तथा नियमित अभ्यास से कुण्डलिनी जागरण और सहजावस्था की प्राप्ति संभव होती है।
बंध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए डॉ. जयन्त नाथ ने कहा कि बंध शरीर के भीतर प्राण ऊर्जा के प्रवाह को नियंत्रित कर उसे सही दिशा प्रदान करता है, जिससे शरीर की शुद्धि होती है। जालंधर बंध, उड्डीयान बंध और मूल बंध के समन्वय को महाबंध कहा जाता है। उन्होंने बताया कि जालंधर बंध थायराइड संबंधी समस्याओं तथा उड्डीयान बंध पेट एवं आंतों से जुड़ी समस्याओं में लाभकारी माना जाता है। साथ ही, इनका नियमित अभ्यास तंत्रिका तंत्र को सुदृढ़ करने और रक्त संचार को संतुलित रखने में भी सहायक होता है।
सहवक्ता के रूप में महायोगी गुरु गोरक्षनाथ शोधपीठ, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के निदेशक प्रो. कुशलनाथ मिश्र ने कहा कि मुद्रा एवं बंध शरीर, मन और आत्मा के समन्वय की वैज्ञानिक विधि हैं। इनके माध्यम से साधक आनंद की अनुभूति करता है तथा अणिमा, महिमा सहित अष्ट सिद्धियों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। उन्होंने कहा कि गोरखनाथ ने आठ प्रमुख मुद्राओं का वर्णन किया है। जालंधर एवं उड्डीयान बंध के अभ्यास से थकान कम होती है तथा शरीर के हार्मोन संतुलित रहते हैं। उन्होंने इनका अभ्यास सदैव योग्य गुरु के मार्गदर्शन में करने की सलाह दी।
प्रास्ताविक वक्तव्य देते हुए गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य डॉ. प्रांगेश मिश्र ने कहा कि मन और प्राण अत्यंत चंचल हैं। साधना में सफलता के लिए दोनों का नियंत्रण आवश्यक है। मुद्रा मन को नियंत्रित करती है, जबकि बंध प्राण के नियंत्रण का माध्यम है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री गोरखनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी योगी कमलनाथ ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ अतुल कुमार तिवारी के वैदिक मंगलाचरण से हुआ तथा संचालन गोरक्षनाथ संस्कृत विद्यापीठ के आचार्य डॉ. दिग्विजय शुक्ल ने किया। अंत में महायोगी गुरु गोरखनाथ योग संस्थान के योग प्रशिक्षक नवनीत चौधरी ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. रोहित मिश्र, कमलेश मौर्य, दीप नारायण, बृजेश मणि मिश्र, पुरुषोत्तम चौबे, शशिकुमार एवं रवि सहित अनेक योग साधक एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे।