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    Home » मादक पदार्थों का नशा – मस्तिष्क को अनियंत्रित करने वाला घातक जहर

    मादक पदार्थों का नशा – मस्तिष्क को अनियंत्रित करने वाला घातक जहर

    P.K. RastogiBy P.K. RastogiJune 26, 2026

    (नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ विश्व दिवस – 26 जून 2026)

    लेखक – डॉ. प्रितम भि. गेडाम

    विचार मंथन: समस्त जीव-जगत में मनुष्य को सबसे बुद्धिमान प्राणी माना जाता है और इसका प्रमुख कारण उसका विकसित मस्तिष्क हैं। मानव शरीर की प्रत्येक गतिविधि, निर्णय और व्यवहार का संचालन मस्तिष्क द्वारा ही किया जाता हैं। यदि मस्तिष्क सही ढंग से कार्य न करे तो मनुष्य का अस्तित्व मात्र एक जिंदा लाश तक सीमित रह जाता हैं। दुर्भाग्यवश, नशा सबसे पहले और सबसे अधिक इसी मस्तिष्क पर आघात करता है। मादक पदार्थों का सेवन व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता को प्रभावित कर देता है, जिससे वह सही और गलत के बीच का अंतर समझने में असमर्थ हो जाता हैं। नशे की स्थिति में व्यक्ति का अपने व्यवहार और भावनाओं पर नियंत्रण कम हो जाता हैं। यही कारण है कि अनेक अपराधों के पीछे नशे की महत्वपूर्ण भूमिका देखी जाती हैं। नशे की लत पूरी करने के लिए लोग चोरी, लूट, हिंसा और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों का सहारा लेते हैं। आर्थिक तंगी बढ़ने पर कई बार स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि व्यक्ति अपने ही परिवार के सदस्यों के साथ हिंसक व्यवहार करने लगता हैं। समाचारों में अक्सर ऐसी घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ नशे की लत के कारण परिवार टूट जाते हैं और निर्दोष लोगों की जान तक चली जाती हैं। नशा केवल मस्तिष्क को ही नहीं, बल्कि शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को भी धीरे-धीरे नुकसान पहुँचाता हैं। इसका परिणाम अनेक गंभीर और महंगी बीमारियों के रूप में सामने आता है, जो अंततः असमय मृत्यु का कारण बन सकती हैं। इसलिए नशा किसी भी रूप में मनोरंजन या राहत का साधन नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जीवन को नष्ट करने वाला जहर हैं।

    भारत सरकार का सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय प्रत्येक वर्ष नशा मुक्ति के लिए जागरूकता अभियान चलाता हैं। वर्ष 2026 में 17 जून से 26 जून तक ‘नशा मुक्त सप्ताह’ मनाया जा रहा है, जिसके अंतर्गत देशभर में विविध जनजागृति कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इस वर्ष की थीम है— “वैश्विक स्तर पर ड्रग समस्या : इससे उत्पन्न चुनौतियाँ और उनके नए समाधान।” यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज नशीले पदार्थों की उपलब्धता और पहुँच पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई हैं। छोटे बच्चों से लेकर युवाओं और वृद्धों तक, हर आयु वर्ग के लोग किसी न किसी रूप में इस समस्या की चपेट में आ रहे हैं।

    हाल ही में समाचारों में प्रकाशित जानकारी के अनुसार नागपुर में पांच महीनों के भीतर पांच करोड़ रुपये मूल्य की नशीली सामग्री जब्त की गई। यदि एक शहर की यह स्थिति है, तो पूरे राज्य और देश में मादक पदार्थों की तस्करी का वास्तविक स्वरूप कितना व्यापक होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता हैं। यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की चुनौती नहीं है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए भी गंभीर खतरा है। देश का युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति माना जाता हैं। यदि यही युवा नशे की गिरफ्त में आ जाए तो समाज और देश दोनों का विकास प्रभावित होता हैं। पहले के समय में कुछ लोग यह मानते थे कि नशा थकान दूर करता है या मानसिक तनाव कम करता हैं। सीमित शिक्षा और मनोरंजन के साधनों के कारण ऐसी धारणाएँ प्रचलित थीं। किंतु आज, जब शिक्षा, तकनीक और जागरूकता के अनेक साधन उपलब्ध हैं, तब भी बड़ी संख्या में युवा नशे को आधुनिकता, मौज-मस्ती या सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रहे हैं। यह प्रवृत्ति अत्यंत चिंताजनक हैं।

    जब परिवार का कोई एक सदस्य भी नशे का आदी हो जाता है, तो उसके दुष्परिणाम पूरे परिवार को भुगतने पड़ते हैं। परिवार आर्थिक संकट, मानसिक तनाव, सामाजिक अपमान और भावनात्मक पीड़ा का सामना करता हैं। नशे की लत व्यक्ति को धीरे-धीरे उसकी जिम्मेदारियों से दूर कर देती हैं। वह अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में असफल होने लगता है और परिवार के अन्य सदस्य स्वयं को असुरक्षित तथा असहाय महसूस करते हैं। यदि परिवार का मुखिया ही नशे का शिकार हो जाए, तो पूरे परिवार का भविष्य संकट में पड़ता हैं। नशा केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास में भी बड़ी बाधा हैं। इससे अपराध, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी और सामाजिक अस्थिरता जैसी अनेक समस्याएँ बढ़ती हैं। जिन देशों में नशीले पदार्थों का व्यापार बड़े पैमाने पर फैला है, वहाँ सामाजिक और आर्थिक विकास गंभीर रूप से प्रभावित हुआ हैं। इसलिए नशे के विरुद्ध संघर्ष केवल स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी हैं।

    बच्चों और किशोरों को नशे से दूर रखने में अभिभावकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। केवल बच्चों की इच्छाएँ पूरी करना या उन्हें भौतिक सुविधाएँ उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं हैं। अभिभावकों को यह जानना चाहिए कि उनके बच्चे किन लोगों के संपर्क में हैं, कहाँ समय बिताते हैं और किन गतिविधियों में शामिल रहते हैं। बच्चों के व्यवहार में होने वाले परिवर्तनों को समझना और समय रहते उचित मार्गदर्शन देना आवश्यक हैं। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ बच्चे बिना किसी डर के अपने विचार और समस्याएँ साझा कर सकें। यदि माता-पिता बच्चों के मित्र बनकर संवाद स्थापित करें, तो बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोका जा सकता हैं। बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उनके संस्कार, नैतिक शिक्षा और जीवन मूल्यों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक हैं।

    आज समाज में कई ऐसी घटनाएँ देखने को मिलती है, जहाँ नशे की हालत में लोग गंभीर अपराध कर बैठते हैं। ऐसी घटनाएँ यह स्पष्ट करती हैं कि नशा व्यक्ति की निर्णय क्षमता को किस हद तक प्रभावित कर सकता हैं। इसलिए केवल अपराधी को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन सामाजिक परिस्थितियों और लापरवाहियों पर भी विचार करना आवश्यक है, जो ऐसी घटनाओं को जन्म देती हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश में नशे की शुरुआत की औसत आयु लगभग 12 से 13 वर्ष है, जो अत्यंत चिंताजनक तथ्य हैं। करोड़ों लोग शराब, गांजा, चरस, ओपिओइड्स तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। विश्व स्तर पर भी नशीली दवाओं के उपयोग में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही हैं। अवैध मादक पदार्थों का उत्पादन और तस्करी संगठित अपराध को बढ़ावा दे रही है तथा अनेक देशों के लिए गंभीर चुनौती बन चुकी हैं।

    इस समस्या से निपटने के लिए अत्यधिक कड़े कानून की आवश्यकता हैं। नशे की गिरफ्त में आए लोगों को उपचार, पुनर्वास और भावनात्मक सहयोग की भी आवश्यकता होती हैं। तनाव, अकेलापन, चिंता, सामाजिक दबाव और भावनात्मक अस्थिरता जैसे कारण भी युवाओं को नशे की ओर धकेलते हैं। इसलिए उन्हें सकारात्मक जीवन मूल्यों, स्वस्थ जीवनशैली, आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती की दिशा में मार्गदर्शन देना आवश्यक हैं। देशभर में नशा मुक्ति केंद्र, पुनर्वास केंद्र और सहायता सेवाएँ उपलब्ध हैं। नशामुक्त भारत अभियान के अंतर्गत हेल्पलाइन नंबर 14446 भी संचालित किया है, जहाँ सहायता प्राप्त की जा सकती हैं। जीवन अनमोल है और इसे नशे जैसी विनाशकारी आदतों में बर्बाद नहीं किया जाना चाहिए। यदि हम स्वयं जागरूक बनें और दूसरों को भी जागरूक करें, तो नशामुक्त समाज और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। नशा जीवन में सुख, सफलता और सम्मान नहीं लाता, बल्कि धीरे-धीरे व्यक्ति, परिवार और समाज को विनाश की ओर ले जाता हैं। इसलिए हमें संकल्प लेना चाहिए कि स्वयं नशे से दूर रहेंगे और दूसरों को भी इससे बचाने का प्रयास करेंगे। यही स्वस्थ, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की सबसे मजबूत नींव हैं।

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    पवन कुमार रस्तोगी पिछले पाँच वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में न्यूज़ पोर्टल में एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने एम.ए., बीएड, पत्रकारिता तथा एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर क्षेत्र में एडीसीए तथा कला के क्षेत्र में बॉम्बे आर्ट जैसे पाठ्यक्रम भी पूर्ण किए हैं। समाचार लेखन, संपादन, जनसरोकार से जुड़े विषयों और डिजिटल पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है। निष्पक्ष, तथ्यपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। वे सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं जनहित से जुड़े मुद्दों को सरल, सटीक और विश्वसनीय ढंग से पाठकों तक पहुँचाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

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