रिपोर्ट: विजय नागपाल।
मथुरा। आरक्षण समाज में उस घुन की तरह है जो समाज को अन्दर ही अन्दर खाए जा रहा है। आरक्षण देश के लिए अत्यंत घातक है। आरक्षण के कारण वो बच्चे उस जगह तक नहीं पहुंच पाते हैं। आरक्षण के कारण देश और समाज को एक दिन बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
इस बात को इस तरह समझो जिस बच्चे में योग्यता नहीं है यदि वह आरक्षण की बैशाखी पर चढ़कर शिक्षक बन गया तो क्या वह विद्यालय में उच्च शिक्षा दे पाएगा? जिसके अन्दर स्वयं की योग्यता नहीं है तो फिर वह योग्य शिष्य कैसे तैयार कर सकता है। जबकि शिक्षक एक राष्ट्र निर्माता होता है क्योंकि विद्यालय से निकले हुए बच्चे देश का भविष्य होते हैं। उन्हीं बच्चों में से कोई डॉक्टर बनेगा, कोई इंजीनियर बनेगा, कोई वकील बनेगा, कोई जल सेना, थल सेना और वायुसेना के अधिकारी बनेगा।
एक बार चिन्तन अवश्य करें कि यदि एक बच्चा आरक्षण के आधार पर डॉक्टर बन गया तो वह मरीज को क्या उचित चिकित्सा दे पाएगा? जो बच्चा आरक्षण के आधार पर इंजीनियर बन गया तो क्या उसके बनाए हुए पुल और बिल्डिंग सुरक्षित होंगी? यदि वह वकील बन गया तो क्या वह उचित न्याय संगत न्याय कर पाएगा?
इस तरह से समाज और देश दोनों को इसका खामियाजा उठाना पड़ेगा। मेरा मानना है कि योग्यता में कोई समझौता नहीं होना चाहिए। जातिगत आधार पर आरक्षण आपस में भाईचारे को खत्म कर रहा है। निर्धन हर जाति में होते हैं। वैश्य परिवार अधिकतर धनाढ्य होते हैं परन्तु उनमें भी कुछ लोगों को धनहीन देखा है इसी तरह ब्राह्मण और क्षत्रियों में भी निर्धन हैं। फिर किसी विशेष वर्ग को ही केवल आरक्षण कहां तक उचित है?
आरक्षण की अपेक्षा काबिल बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं इस पर चिन्तन करना चाहिए ये अधिक उचित रहेगा और व्यवस्था हर वर्ग के लिए होना चाहिए न कि किसी विशेष वर्ग के लिए।


