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    Home » जायदाद नहीं, मां-बाप के लिए अदालत पहुंचे तीन बेटे

    जायदाद नहीं, मां-बाप के लिए अदालत पहुंचे तीन बेटे

    P.K. RastogiBy P.K. RastogiNovember 2, 2026

    तीनों बेटों की एक ही जिद, मां-बाप हमारे साथ रहें… भावुक कर देने वाला प्रेरक प्रसंग।

    समाज का आईना। आमतौर पर अदालतों में संपत्ति और जमीन-जायदाद के विवाद देखने को मिलते हैं, लेकिन कल्पना कीजिए एक ऐसे परिवार की, जहां तीन बेटे अपने बूढ़े माता-पिता को अपने साथ रखने के लिए अदालत पहुंच जाएं। यह प्रसंग समाज को रिश्तों, संस्कारों और माता-पिता के प्रति बच्चों के कर्तव्यों का अनूठा संदेश देता है।

    जिला न्यायालय का कमरा नंबर 7 लोगों से खचाखच भरा हुआ था।

    बाहर खड़े लोग एक-दूसरे से पूछ रहे थे—

    “किस बात का केस है?”

    किसी ने जवाब दिया—

    “सुना है तीनों बेटे लड़ रहे हैं…”

    एक आदमी हँसकर बोला—

    “फिर वही ज़मीन-जायदाद का झगड़ा होगा।”

    तभी कोर्ट का दरवाज़ा खुला।

    अंदर जो दृश्य था, उसने सबकी सोच बदल दी।

    कटघरे में कोई अपराधी नहीं खड़ा था।

    वहाँ बैठे थे सत्तर वर्षीय रामस्वरूप मिश्रा और उनकी पत्नी सरला देवी।

    दोनों की आँखों में आँसू थे।

    उनके सामने खड़े थे उनके तीनों बेटे—

    विनय, दीपक और मोहित।

    जज ने फाइल खोली और मुस्कुराकर पूछा— “तो बताइए… विवाद क्या है?”

    सबसे बड़े बेटे विनय ने हाथ जोड़कर कहा

    “माननीय न्यायालय… मैं अपने माता-पिता को अपने साथ रखना चाहता हूँ।”

    जज ने दूसरे बेटे की ओर देखा।

    दीपक बोला—

    “नहीं साहब… पिछले दस साल से बड़े भैया ने सबसे ज़्यादा सेवा की है। अब मेरी बारी है। मैं उन्हें अपने घर ले जाना चाहता हूँ।”

    तीसरा बेटा मोहित रोते हुए बोला—

    “दोनों भाई गलत हैं। माँ-बाबूजी मेरे साथ रहेंगे। मैं सबसे छोटा हूँ… मुझे उनका कर्ज़ उतारने दीजिए।”

    पूरा अदालत कक्ष एकदम शांत हो गया।

    ऐसा मुकदमा वहाँ किसी ने पहले कभी नहीं देखा था।

    जज ने पूछा—

    “अगर तीनों अपने माता-पिता को रखना चाहते हैं… तो अदालत क्यों आए?”

    रामस्वरूप जी ने काँपती आवाज़ में कहा— “हुजूर… यही तो हमारी परेशानी है।”

    उन्होंने आगे कहना शुरू किया।

    “हमने तीनों बेटों को ईमानदारी से पाला। खेत बेचकर पढ़ाया। खुद फटे कपड़े पहने, लेकिन बच्चों की फीस कभी नहीं रुकी।”

    “आज हमारी उम्र हो गई है। हम चाहते थे कि किसी एक बेटे के पास रहें ताकि बाकी दो अपने परिवार पर ध्यान दें।”

    “लेकिन…”

    इतना कहते-कहते उनकी आवाज़ भर्रा गई।

    “तीनों बेटे हमें छोड़ने को तैयार ही नहीं हैं।”

    जज ने सबसे बड़े बेटे से पूछा—

    “तुम क्यों रखना चाहते हो?”

    विनय बोला—

    “जब मैं छोटा था, मुझे पोलियो हो गया था। डॉक्टर ने उम्मीद छोड़ दी थी। बाबूजी मुझे रोज़ पाँच किलोमीटर गोद में उठाकर अस्पताल ले जाते थे। अगर उन्होंने हार मान ली होती… तो मैं आज चल भी नहीं पाता। अब उनकी चलने की ताकत चली गई है… तो क्या मैं उन्हें छोड़ दूँ?”

    पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

    दूसरे बेटे दीपक की बारी आई।

    उसने जेब से एक पुराना रूमाल निकाला।

    “यह माँ का है।”

    “जब इंजीनियरिंग की फीस भरने के पैसे नहीं थे, माँ ने अपने शादी के कंगन बेचे थे। लेकिन मुझसे कहा था कि कंगन चोरी हो गए हैं… ताकि मुझे अपराधबोध न हो।”

    उसकी आवाज़ टूट गई।

    “अब माँ मेरे घर नहीं रहेंगी… तो मेरी कमाई किस काम की?

    सबकी नज़र सबसे छोटे बेटे मोहित पर गई।

    वह कुछ देर चुप रहा।

    फिर बोला—

    “जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था, डॉक्टर ने कहा था कि खून तुरंत चाहिए। बाबूजी का ब्लड प्रेशर बहुत कम था… फिर भी उन्होंने अपना खून दिया। डॉक्टर ने मना किया था… लेकिन बाबूजी बोले थे—”

    “अगर बेटे की साँस चलती रहे… तो मेरी कमजोरी कोई मायने नहीं रखती।”

    मोहित फूट-फूटकर रो पड़ा।

    “आज वही बाबूजी बूढ़े हो गए हैं… तो मैं उन्हें किसी और के भरोसे कैसे छोड़ दूँ?”

    अब अदालत में बैठे लोग भी आँसू पोंछ रहे थे।

    जज ने सरला देवी से पूछा—

    “माँ… आप किस बेटे के साथ जाना चाहती हैं?”

    सरला देवी मुस्कुराईं।

    “यही तो मुश्किल है साहब…”

    “तीनों हमारे दिल के टुकड़े हैं।”

    कुछ देर अदालत में खामोशी रही।

    फिर जज ने कहा—

    “आज फैसला कानून नहीं… संस्कार करेंगे।”

    उन्होंने तीनों बेटों से पूछा—

    “अगर मैं माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज दूँ…?”

    तीनों बेटे एक साथ चीख पड़े—

    “नहीं… कभी नहीं!”

    जज की आँखें भीग गईं।

    उन्होंने फैसला सुनाया—

    “यह अदालत आदेश नहीं देगी कि माता-पिता किस बेटे के साथ रहें।”

    “लेकिन यह दर्ज करेगी कि इस शहर में एक ऐसा परिवार है जहाँ बेटे संपत्ति के लिए नहीं… अपने माँ-बाप की सेवा करने के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं।”

    फिर उन्होंने मुस्कुराकर कहा—

    “रामस्वरूप जी और सरला देवी जहाँ चाहें रहें… लेकिन हर रविवार तीनों बेटे, तीनों बहुएँ और सारे पोते-पोतियाँ एक ही छत के नीचे उनके साथ भोजन करेंगे।”

    वहीं अदालत के बाहर मीडिया ने तीनों भाइयों से पूछा—

    “आप लोग यह मामला आपस में भी सुलझा सकते थे।”

    विनय ने जवाब दिया—

    “हाँ… लेकिन हम चाहते थे कि दुनिया भी देखे…”

    दीपक ने बात पूरी की—

    “कि माँ-बाप बोझ नहीं होते…”

    मोहित ने आँसू पोंछते हुए कहा—

    “और जिस घर में माता-पिता के लिए झगड़ा हो… उस घर से बड़ा कोई तीर्थ नहीं होता।”

    उस दिन की खबर अगले दिन अखबार की पहली सुर्ख़ी बनी—

    “पहली बार अदालत में बेटों ने ज़मीन नहीं, माँ-बाप की सेवा का अधिकार माँगा।”

    इस प्रेरक प्रसंग का संदेश है कि माता-पिता की असली विरासत उनकी संपत्ति नहीं, बल्कि उनका स्नेह, त्याग और आशीर्वाद है। जिस माता-पिता ने अपना पूरा जीवन बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिया, उनके बुढ़ापे में बच्चों का भी दायित्व है कि वे उन्हें सम्मान, अपनापन और सहारा दें।

    आज जब बुजुर्गों की उपेक्षा और अकेलेपन की समस्या समाज के सामने चुनौती बन रही है, ऐसे प्रसंग परिवारों को अपने संस्कारों और जिम्मेदारियों पर विचार करने की प्रेरणा देते हैं।

    संदेश : माता-पिता बोझ नहीं, जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं। उनकी सेवा केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि संस्कार और इंसानियत की पहचान है।

    ==============✓

    प्रेरक प्रसंग रिश्तों की मिठास समाज का आईना संस्कार और संस्कृति
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    पवन कुमार रस्तोगी पिछले पाँच वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में न्यूज़ पोर्टल में एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने एम.ए., बीएड, पत्रकारिता तथा एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर क्षेत्र में एडीसीए तथा कला के क्षेत्र में बॉम्बे आर्ट जैसे पाठ्यक्रम भी पूर्ण किए हैं। समाचार लेखन, संपादन, जनसरोकार से जुड़े विषयों और डिजिटल पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है। निष्पक्ष, तथ्यपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। वे सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं जनहित से जुड़े मुद्दों को सरल, सटीक और विश्वसनीय ढंग से पाठकों तक पहुँचाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

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