केके मिश्रा, संवाददाता।
संत कबीर नगर। कृषि विज्ञान केंद्र, संत कबीर नगर के कृषि अभियांत्रिकी अनुभाग द्वारा दिनांक 08 से 12 अक्टूबर, 2026 तक आयोजित पाँच दिवसीय व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम “फसल अवशेष प्रबंधन तकनीक” का सफलतापूर्वक समापन किया गया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन कृषि विज्ञान केंद्र, संत कबीर नगर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी.पी.एन. गौतम ने किया। प्रशिक्षण कार्यक्रम का संयोजन डॉ. देवेश कुमार, वैज्ञानिक (कृषि अभियांत्रिकी) के नेतृत्व में किया गया।
इस दौरान किसानों को फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन, पराली जलाने से होने वाले नुकसान, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, जैविक खाद निर्माण तथा फसल अवशेषों के वैज्ञानिक उपयोग की विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। कार्यक्रम के समापन अवसर पर प्रतिभागी किसानों को प्रमाण-पत्र के साथ प्रक्षेत्र उत्पाद भी वितरित किया गया।
प्रशिक्षण के दौरान डॉ. देवेश कुमार, वैज्ञानिक (कृषि अभियांत्रिकी) ने बताया कि एक टन फसल अवशेष जलाने से लगभग 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फॉस्फोरस, 2.5 किलोग्राम पोटाश तथा 1.2 किलोग्राम सल्फर की हानि होती है। इससे मिट्टी में मौजूद आवश्यक पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और किसानों की उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
उन्होंने बताया कि फसल अवशेषों को जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जिससे आँखों में जलन, त्वचा संबंधी समस्याएँ तथा सूक्ष्म कणों के कारण हृदय एवं फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। इसके अतिरिक्त, पराली जलाने से मृदा का तापमान बढ़ता है, लाभकारी सूक्ष्मजीवों एवं केंचुओं को नुकसान पहुँचता है तथा मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है। इससे पर्यावरण संरक्षण और पशुओं के लिए चारे की उपलब्धता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
इस अवसर पर वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. सी.पी.एन. गौतम ने कहा कि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उचित प्रबंधन करना पर्यावरण संरक्षण, मृदा की उर्वरता बनाए रखने तथा कृषि उत्पादन लागत कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। किसानों को वैज्ञानिक विधियों को अपनाकर फसल अवशेषों का अधिकतम उपयोग करना चाहिए।
डॉ. तरुण कुमार, वैज्ञानिक (वानिकी) ने कहा कि फसल अवशेषों का उचित उपयोग पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कृषि वानिकी तथा जैविक पदार्थों के प्रभावी उपयोग से प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा दिया जा सकता है।
डॉ. दुर्गेश कुमार, वैज्ञानिक (सस्य विज्ञान) ने किसानों को फसल अवशेषों को मिट्टी में मिलाने, खेत में उचित नमी बनाए रखने तथा अवशेषों के शीघ्र अपघटन के लिए पूसा डीकंपोजर जैसी तकनीकों के उपयोग की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन तकनीकों को अपनाने से मृदा में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ाने तथा मृदा स्वास्थ्य में सुधार करने में सहायता मिल सकती है।
डॉ. अभिनव सिंह, वैज्ञानिक (कृषि प्रसार शिक्षा) ने कहा कि किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों का प्रभावी प्रसार तथा प्रशिक्षण के माध्यम से उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाना फसल अवशेष प्रबंधन की सफलता के लिए आवश्यक है। उन्होंने किसानों से पराली जलाने के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक होने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने की अपील की।
डॉ. धर्मेंद्र कुमार, वैज्ञानिक (आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन) ने उन्नत गेहूँ की प्रजातियों के गुणवत्तापूर्ण बीज के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि क्षेत्र की कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप उपयुक्त प्रजातियों, प्रमाणित बीजों तथा अनुशंसित कृषि तकनीकों का उपयोग बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में सहायक होता है।
कार्यक्रम के अंत में किसानों से अपील की गई कि वे फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करें तथा उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाकर मृदा स्वास्थ्य में सुधार, पर्यावरण संरक्षण और कृषि उत्पादकता बढ़ाने में अपना योगदान दें। उक्त व्यावसायिक प्रशिक्षण कार्यक्रम में कुल 25 किसानों ने प्रतिभाग किया।
इस अवसर पर रामकरण यादव, पंकज यादव, श्रीमती पुष्पलता, विजय पांडे, रामरतन भास्कर तथा विशाल कुमार सहित सम्मानित किसान आदि उपस्थित रहे।


