•मानहानि से लेकर निजता के उल्लंघन तक के विकल्प।
लखनऊ। किसी आपराधिक मामले में आरोपी की पहचान उजागर करने वाली तस्वीर प्रकाशित करना कुछ परिस्थितियों में कानूनी और पत्रकारिता के मानकों से जुड़ा गंभीर सवाल बन सकता है। खासकर तब, जब पुलिस को पहचान परेड करानी हो या मामला अभी जांच और सुनवाई के दौर में हो। ऐसे मामलों में संबंधित महिला या व्यक्ति प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया में शिकायत करने के साथ मानहानि और निजता के उल्लंघन के आधार पर कानूनी रास्ता अपना सकते हैं। हालांकि, केवल तस्वीर प्रकाशित कर देना अपने आप में अपराध या अदालत की अवमानना नहीं माना जाएगा। कार्रवाई का आधार खबर की सामग्री, उसके प्रकाशन का उद्देश्य, उससे हुए नुकसान और मामले की परिस्थितियां होंगी।
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्रकारिता आचरण संबंधी मानकों के अनुसार समाचार प्रकाशित करते समय निष्पक्षता, संतुलन और संयम बनाए रखना जरूरी है। किसी व्यक्ति को अदालत से दोषी साबित होने से पहले अपराधी घोषित करना या उसकी निजी जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप करना पत्रकारिता के मानकों के विपरीत हो सकता है। संबंधित व्यक्ति प्रेस काउंसिल में शिकायत कर सकता है। शिकायत की जांच के बाद परिषद अखबार, समाचार एजेंसी, संपादक या पत्रकार को चेतावनी दे सकती है, फटकार लगा सकती है अथवा उनके आचरण की निंदा कर सकती है।
हालांकि, परिषद के वैधानिक अधिकारों में सीधे माफी प्रकाशित कराने या सरकारी विज्ञापन बंद कराने का आदेश देना शामिल नहीं है।
दूसरा विकल्प मानहानि का मुकदमा हो सकता है। यदि किसी समाचार में प्रकाशित तस्वीर या उसके साथ दी गई सामग्री से संबंधित महिला की सामाजिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है और प्रकाशन मानहानि की कानूनी परिभाषा के दायरे में आता है, तो वह संपादक और प्रकाशक सहित जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई पर विचार कर सकती है। दीवानी मामले में प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए हर्जाने की मांग की जा सकती है। आपराधिक मानहानि के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 356 में प्रावधान है। इसके तहत दोष सिद्ध होने पर अधिकतम दो वर्ष का साधारण कारावास, जुर्माना, दोनों अथवा सामुदायिक सेवा की सजा हो सकती है।
हालांकि, हर तस्वीर का प्रकाशन मानहानि नहीं होता। इसके लिए कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों और अपवादों पर भी विचार किया जाएगा।
तीसरा पहलू न्यायिक प्रक्रिया और पहचान परेड से जुड़ा है। यदि पुलिस किसी आरोपी की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पहचान परेड कराने वाली है और उससे पहले अखबार में उसकी तस्वीर प्रकाशित हो जाती है, तो बचाव पक्ष यह दलील दे सकता है कि इससे गवाह की स्वतंत्र पहचान प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में अदालत के सामने आपत्ति उठाई जा सकती है। यदि किसी प्रकाशन से न्यायिक कार्यवाही प्रभावित होने या न्याय प्रशासन में बाधा पहुंचने का पर्याप्त आधार हो, तो न्यायालय अवमानना के पहलू पर विचार कर सकता है।
हालांकि, केवल फोटो प्रकाशित होने से स्वतः अदालत की अवमानना नहीं बनती और न ही इससे पूरा आपराधिक मामला अपने आप समाप्त हो जाता है। न्यायालय तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय करता है।
इसके अलावा, निजता के अधिकार के उल्लंघन का मामला भी उठाया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में निजता का अधिकार भी शामिल है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके निजता संबंधी अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो वह परिस्थितियों के अनुसार उच्च न्यायालय में रिट याचिका दाखिल कर सकता है। अदालत मामले के तथ्यों, सार्वजनिक हित, निजता के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन को ध्यान में रखकर विचार कर सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी और दोषी के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। अदालत में अपराध साबित होने तक किसी व्यक्ति को दोषी बताकर प्रस्तुत करना उचित नहीं है। समाचार प्रकाशित करते समय आरोपी की पहचान, तस्वीर और निजी जानकारी के इस्तेमाल में सावधानी बरतना पत्रकारिता की निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।


