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    Home » दारुक वन गुजरात का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

    दारुक वन गुजरात का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग।

    P.K. RastogiBy P.K. RastogiAugust 30, 2026

    •आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी 

    विचार मंथन: गुजरात के द्वारका के पास स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर भगवान शिव के 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से एक है। इसे प्राचीन काल में ‘दारुक वन’ कहा जाता था। यह गुजरात के सौराष्ट्र तट पर द्वारका शहर और भेंट द्वारका द्वीप के बीच में बसा है । नागेश्वर को दारुक वन के नाम से भी जाना जाता था, जो भारत के एक वन का प्राचीन नाम है। भगवान शिव का नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर, जो भूमिगत गर्भगृह में दुनिया के 12 स्वयंभू ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग है।

    गुजरात के द्वारकापुरी से करीब 25 किलोमीटर दूर भगवान शिव का दसवां ज्योतिर्लिंग श्री नागेश्वर महादेव स्थित है जिसके दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। इसकी एक विशेषता ये भी है कि अन्य ज्योतिर्लिंगों की तरह इस ज्योतिर्लिंग का अभिषेक साधारण जल से नहीं किया जा सकता। नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अभिषेक केवल गंगाजल से किया जाता है जो कि मंदिर प्रशासन की ओर से निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है। इस मंदिर के बाह्य भाग पर महादेव की एक विशाल प्रतिमा है जो यहाँ का मुख्य आकर्षण है। ये इतनी विशाल है कि मंदिर की ओर जाते हुए ये कई किलोमीटर पहले से ही दिख जाती है।

    शिव पुराण के अनुसार, इस वन में दारुक नामक राक्षस और उसकी पत्नी दारुका राज करते थे। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक भयानक राक्षस था जिसका नाम दारुक था। उसकी पत्नी दारुका ने कठिन तपस्या कर देवी पार्वती को प्रसन्न कर लिया और उनसे ये वरदान प्राप्त किया कि जिस जंगल में वे रहते हैं वहाँ कोई उनसे जीत ना सके एवं वे अपनी इच्छानुसार इस जंगल को अपने साथ ले जा सकें। इस प्रकार के वर को प्राप्त कर उन्होंने पूरे विश्व में त्राहि-त्राहि मचा दी। वे जहाँ चाहते उस जंगल के साथ पहुँच जाते और अत्याचार करते किन्तु देवी पार्वती के आशीर्वाद के कारण कोई उनका कुछ अहित ना कर पाता। 

    जब उनका आतंक हद से अधिक हो गया तो अन्य ऋषि-मुनि महर्षि और्व के पास पहुँचे और उनसे सहायता माँगी। जब ऋषि और्व ने उनका दुःख सुना तो उन्होंने क्रोधित हो दारुक और दारुका को श्राप दे दिया कि अगर वे किसी भी तप में लीन व्यक्ति पर आक्रमण करेंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।

    तब इस श्राप के भय से दारुक और दारुका ने अपने उस जंगल को समुद्र के बीचों बीच स्थित कर दिया और वहाँ से आने वाले व्यापारियों को लूटना आरम्भ कर दिया।

    वहाँ से कुछ दूर नगर में सुप्रिय नाम का एक परम शिवभक्त वैश्य रहता था। एक बार वो अपनी पत्नी सहित व्यापार का सामान लेकर उसी समुद्र से गुजर रहा था कि उस वन में दारुक ने उसे पत्नी सहित बंदी बना लिया। उसपर अनेक अत्याचार किये गए और उसे कारागार में डाल दिया गया। कारागार में भी सुप्रिय लगातार भगवान शिव की आराधना करते रहे। 

    वैश्य सुप्रिय वहाँ भी अपनी पत्नी सहित भगवान शिव का पार्थिव शिवलिंग बना कर उसकी पूजा में तल्लीन हो गया। एक बार दारुक ने उसे शिव पूजा में लीन देखा और क्रोधित हो उसे मारने हेतु उस कारगर में पहुँचा। शस्त्र सहित उस महाभयंकर असुर को देख कर भी सुप्रिय भयभीत नहीं हुआ और अपनी पूजा करता रहा। उसे विश्वास था कि भगवान शिव के रहते उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता। 

    जब दारुक ने देखा कि सुप्रिय पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो उसने उसे मारने के लिए अपना खड्ग उठाया। तभी उसी जगह सूर्य के तेज को लज्जित करने वाले महारुद्र एक स्वर्ण सिँहासन पर प्रकट हुए। तब दारुक ने भयभीत होते हुए महादेव से कहा – “हे प्रभु! मुझ जैसे साधारण राक्षस को मारने के लिए आप स्वयं यहाँ आये हैं जो सर्वथा उचित नहीं है। आपके और मेरे बल का क्या मेल अतः अगर आप मुझ निर्बल पर प्रहार करेंगे तो ये अन्याय हो जाएगा। अगर ये सुप्रिय आपका इतना बड़ा भक्त है तो इसी को मेरा सामना करने दें।”

    तब महादेव ने हँसते हुए सुप्रिय को अपना प्रलयंकारी पाशुपतास्त्र प्रदान किया जिसके प्रहार से सुप्रिय ने क्षण भर में ही दारुक का उसके सभी बंधू-बांधवों सहित नाश कर दिया। तब सुप्रिय ने भगवान शिव से उसी स्थान पर रुकने की प्रार्थना की जिसे स्वीकार कर महादेव वहाँ नागेश्वर नाम से स्थित हो गए। दारुक का विनाश करने के कारण उनका एक नाम दारुक नागेश्वर भी पड़ा। भक्ति भाव से लिप्त सुप्रिय अपनी पत्नी सहित शिवलोक को चला गया। जो कोई भी इस पवित्र तीर्थ का दर्शन करता है उसके समस्त शत्रुओं का नाश हो जाता है और वो निश्चय ही शिवलोक को प्राप्त करता है।

    भक्त की अडिग भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए और राक्षस का वध किया। तभी से यह स्थान नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रसिद्ध हुआ।

    एक अन्य पौराणिक कथा के मुताबिक, बौने ऋषियों के समूह ‘बालखिल्य’ ने दारुक वन में काफी समय तक भगवान शिव की पूजा की। उनकी भक्ति और धैर्य की परीक्षा लेने के लिए भगवान शिव उनके सामने नग्न अवस्था में प्रकट हुए, जिनके शरीर पर सिर्फ नाग (सांप) थे।

    ऋषियों की पत्नियां उस संत से काफी आकर्षित हुईं और अपने पतियों को छोड़कर उनके पीछे चल पड़ीं। इससे ऋषि व्याकुल होने के साथ काफी क्रोधित हो उठे। उन्होंने अपना धैर्य खो दिया और तपस्वी को श्राप दिया कि उनका लिंग गिर जाए।

    शिवलिंग पृथ्वी पर गिर गया और पूरी दुनिया कांप उठी। भगवान ब्रह्मा और विष्णु उनके पास आए और उनसे पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए अपना लिंग वापस लेने का अनुरोध किया। शिव ने उन्हें सांत्वना दी और अपना लिंग वापस ले लिया।

    इस कथा का वर्णन वामन पुराण के 6ठें और 45वें अध्याय में देखने को मिलता है। इसके बाद भगवान शिव ने सदा-सदा के लिए दारुक वन में ज्योतिर्लिंग के रूप में अपनी दिव्य उपस्थिति का वचन दिया।

    नागेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर में भगवान शिव की लगभग 125 फीट (25 मीटर) ऊंची भव्य और विशाल मूर्ति स्थापित है, जिसके दर्शन दूर से ही हो जाते हैं।

    जटिल वास्तुकला और मनमोहक मूर्तियों के साथ मंदिर अपने आप में आध्यात्मिक सुकून का एहसास कराता है। शिव पुराण के मुताबिक, यहाँ दर्शन और आराधना करने से भक्तों को सभी प्रकार के विष, भय और सांप के काटने या कालसर्प दोष आदि से मुक्ति मिलती है और सांसारिक प्रलोभनों से रक्षा होती है।

    वैसे तो ये मंदिर और शिवलिंग बहुत प्राचीन है किन्तु वर्तमान के मंदिर का निर्माण टी सीरीज के मालिक गुलशन कुमार ने 1996 ई में शुरू करवाया किन्तु बीच में उनकी हत्या हो जाने के बाद इसे उनके परिवार ने पूर्ण किया। इसके निर्माण में करीब एक करोड़ पच्चीस लाख का खर्च आया था जिसे गुलशन कुमार चैरिटबल ट्रस्ट ने अदा किया था। टी सीरीज द्वारा बनाये गए कई धार्मिक विडिओ में भी आपको इस मंदिर के दर्शन हो जाएंगे। मूल शिवलिंग मंदिर के गर्भगृह में स्थित है जो काफी बड़े आकर का है। इसके ऊपरी हिस्से पर चाँदी का आवरण चढ़ाया गया और साथ ही साथ शिवलिंग के ऊपर चाँदी द्वारा निर्मित नाग की प्रतिमा है जो इसके नाम को सार्थक करती है। इस शिवलिंग के पीछे देवी पार्वती की प्रतिमा स्थापित की गयी है।

    गर्भगृह में सभी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहाँ केवल वही प्रवेश कर सकते हैं जिन्हे अभिषेक करवाना हो और पुरुष यहाँ केवल धोती धारण करके ही प्रवेश कर सकते हैं। 

    इस शिवलिंग के अतिरिक्त भारत में तीन अन्य शिवलिंगों को नागेश्वर कहा जाता है। इसमें से एक हैदराबाद के निकटऔढ़ाग्राम में स्थित है और दूसरा उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित शिवलिंग है जिसे नागेश्वर के साथ जागेश्वर महादेव भी कहा जाता है। हालाँकि इन दोनों जगह के स्थानीय निवासी इन्हे ही ज्योतिर्लिंग मानते हैं। अयोध्या में राम जी पुत्र कुश द्वारा स्थापित नागेश्वर नाथ मंदिर का भी इस क्षेत्र में बहुत महत्व है। शिवपुराण के अनुसार श्रीकृष्ण की नगरी द्वारकापुरी के निकट नागेश्वर शिवलिंग को ही वास्तविक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग माना जाता है।

    https://www.facebook.com/share/r/1HcBQMUrC6/

    लेखक परिचय:-

    (लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं। 

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    पवन कुमार रस्तोगी पिछले पाँच वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता एवं डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में न्यूज़ पोर्टल में एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इन्होंने एम.ए., बीएड, पत्रकारिता तथा एलएलबी की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त कंप्यूटर क्षेत्र में एडीसीए तथा कला के क्षेत्र में बॉम्बे आर्ट जैसे पाठ्यक्रम भी पूर्ण किए हैं। समाचार लेखन, संपादन, जनसरोकार से जुड़े विषयों और डिजिटल पत्रकारिता में उनकी विशेष रुचि है। निष्पक्ष, तथ्यपरक और प्रभावशाली पत्रकारिता उनकी कार्यशैली की प्रमुख विशेषता है। वे सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक एवं जनहित से जुड़े मुद्दों को सरल, सटीक और विश्वसनीय ढंग से पाठकों तक पहुँचाने के लिए निरंतर कार्यरत हैं।

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