•आचार्य डॉ.राधेश्याम द्विवेदी
ब्रह्मा पुत्र मरीचि की संतानें :-
मरीचि ब्रह्मा के मानसपुत्र थे। इन्हें ब्रह्मा जी के मन या नेत्र से उत्पन्न हुआ माना जाता है। ये ब्रह्मा जी के दस मुख्य प्रजापतियों में गिने जाते हैं, जिन्हें सृष्टि के विस्तार का कार्य सौंपा गया था। इनका विवाह कला या संभूति, पूर्णिमा और ऊर्णा से हुआ था। कला पत्नी से मरीचि के दो पुत्र कश्यप और पूर्णमवास हुए थे। कश्यप ऋषि से ही आगे चलकर देवता, असुर, और समस्त जीव-जंतुओं की उत्पत्ति हुई।
ऊर्णा मरीचि की दूसरी पत्नी थीं। ऊर्णा के छह पुत्र थे। उन्होंने ब्रह्मा को अपनी पुत्री के पीछे भागते देखकर हँसी उड़ाई। एक महान व्यक्तित्व का अपमान करने के इस अपराध के कारण, उन्हें राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा। ब्रह्मा के श्राप के कारण वे पहले हिरणाक्ष के पौत्र और कालनेमी के पुत्रों के रूप में और अगले जन्म में वासुदेव और देवकी के पुत्रों के रूप में पैदा हुए । ये छह बच्चे ही श्री कृष्ण के बड़े भाई ‘षडगर्भ’ कहलाए थे, जिन्हें कंस ने जन्म के तुरंत बाद मार डाला था।
जय और विजय हिरणाक्ष और हिरण्यकशिपु हुए थे –
हिरणाक्ष महर्षि कश्यप और दिति का पुत्र था। उसका उद्धार वराह अवतार में बिष्णु जी ने किया था। वह हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई था जिसका वध बाद में भगवान विष्णु जी ने नृसिंह अवतार लेकर किया था। हिरणाक्ष की एक बहन भी थी जिसका नाम होलिका था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु असल में वैकुंठ लोक में भगवान विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। चार कुमारों सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनि में जन्म लेना पड़ा था।
हिरण्याक्ष हिंदू पौराणिक कथाओं सनातन धर्म में एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य (राक्षस) था, जिसका वध भगवान विष्णु ने वराह अवतार (सूअर के रूप) में किया था। भागवत पुराण) के अनुसार एक अन्य कालनेमि विरोचन का पुत्र और प्रह्लाद का पौत्र (तथा हिरण्यकशिपु का भतीजा था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यही असुर कालनेमि बाद में द्वापरयुग में मथुरा के अत्याचारी राजा कंस के रूप में पैदा हुआ था, जिसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था।
षडगर्भ भाइ कालनेमी के पुत्र रहे –
कालनेमी के छह पुत्र थे: हंस, सुविक्रम, क्रथा, दमना, रिपुरमर्दना और क्रोधहंत। इन्हे हिरण्यकशिपु का श्राप था। हरि-वंश (विष्णु-पर्व का द्वितीय अध्याय) में लिखा है कि हंस, सुविक्रम, क्रत, दमन, रिपु-मर्दन और क्रोध-हंता, जिन्हें षड-गर्भ (छह अजन्मे बच्चे) के रूप में जाना जाता है, राक्षस कालनेमि के पुत्र हैं। उन्होंने अपने दादा हिरण्यकशिपु को बिना बताए, सर्वपिता ब्रह्मा की उपासना के लिए घोर तपस्या की। ब्रह्मा उनकी अत्यावश्यकता से प्रसन्न होकर, उनकी प्रार्थनाओं के अनुसार उन्हें मृत्यु से सुरक्षा का वरदान प्रदान किया। बाद में, जब हिरण्यकशिपु को इस घटना के बारे में पता चला, तो वह क्रोधित हो गया और बोला, “तुमने मुझे बिना बताए ब्रह्मा की पूजा की है, इसलिए मैं तुम जैसे धृष्ट लोगों से कोई स्नेह नहीं रखता। तुम्हारे पिता स्वयं तुम सबको मार डालेंगे। अगले जन्म में तुम छहों देवकी के गर्भ में जन्म लोगे और तुम्हारे पिता कालनेमि कंस के रूप में जन्म लेंगे। वही कंस तुम्हारा हत्यारा होगा।” हिरण्यकशिपु के इस श्राप के कारण वे देवकी के गर्भ में जन्म लिए और कालनेमि के अवतार कंस द्वारा मारे गए।
श्री कृष्ण ने मां को षडगर्भ पुत्रों का दर्शन कराया था –
श्रीमद्-भागवत (10.85.47-57) में उल्लेख है कि माता देवकी की प्रार्थना के कारण श्री राम और श्री कृष्ण उनके छह मृत पुत्रों को श्री बलिराज की सुतल-पुरी से वापस लाए थे। सुतलपुरी जाने के बाद श्री कृष्ण ने दैत्यों के राजा बलि से कहा, “हे दैत्यों के स्वामी, स्वायंभुव के मन्वंतर में महर्षि मरीचि की पत्नी ऊर्णा देवी के गर्भ से छह देव जैसे पुत्र उत्पन्न हुए। ब्रह्मा को अपनी पुत्री (सरस्वती) के पीछे भागते देख उन्होंने उनका उपहास किया। इस पाप के फलस्वरूप – हिरण्यकशिपु के भाई के पुत्र कालनेमि के पुत्रों के रूप में राक्षसी योनि में जन्म लिया। फिर वहाँ से योगमाया के द्वारा उन्हें देवकी के गर्भ में जन्म लेने के लिए विवश किया गया और कंस द्वारा मार डाला गया। माता देवकी उनके लिए शोक मना रही है, उन्हें अपने पुत्रों के समान मानती है। वे इस समय आपके धाम में निवास कर रहे हैं। उनके मातृ शोक को कम करने के लिए मैं उन्हें इस स्थान से उनकी माता से मिलाने के लिए ले जाऊँगा। अंततः, वे अपने श्राप और शोक से मुक्त होकर देवताओं के लोकों में लौट जाएँगे।
ब्रह्मा की तपस्या और श्राप दोनों मिला-
ब्रह्मा की तपस्या करने के कारण, उनके दादा हिरण्यकशिपु ने पहले उन्हें पाताल में लंबे समय तक सोने का श्राप दिया, और फिर उनके श्राप को बदलकर उन्हें देवकी के पहले छह पुत्रों के रूप में पृथ्वी पर जन्म लेने का आदेश दिया । पिता, कालनेमी, उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में पुनर्जन्म लेंगे और उनके मामा होंगे, जो जन्म के तुरंत बाद उन सभी की हत्या कर देंगे। भागवत पुराण और हरिवंश पुराण के अनुसार, देवकी के पहले छह पुत्रों को जन्म लेते ही अत्याचारी कंस ने मार दिया था। कारागार में जन्म होने और मृत्यु के भय के कारण इनका नामकरण संस्कार नहीं हो पाया था।श्रीकृष्ण के वे छह भाई, जिन्हें ‘षद्गर्भ’ कहा जाता है, कंस द्वारा अपने जन्म के तुरंत बाद मार दिए जाने के कारण अल्पायु रहे। इसके पीछे पौराणिक कथा यह है कि वे पूर्व जन्म में मरीचि ऋषि के पुत्र थे और उन्हें हिरण्यकशिपु का श्राप मिला था। हरिवंश पुराण के अनुसार, ये प्रत्यूष वसु के पुत्र थे। इन्हें देवर्षि और वेदों-उपनिषदों का मर्मज्ञ माना गया है।
ब्रह्मा जी ने षड गर्भ को शाप दिया था
एक बार उन छहों ऋषिकुमारों ने किसी बात पर ब्रह्मा जी का उपहास (मजाक) उड़ा दिया था।इससे क्रोधित होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें असुर योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया था। वे असुरराज कालनेमि के पुत्र बने, जो बाद में हिरण्यकशिपु के वंश से जुड़े और ‘षड-गर्भ’ कहलाए।
हिरण्यकशिपु ने भी श्राप दिया था :-
पौराणिक कथाओं के अनुसार, ये छहों राजकुमार हंस, सुविक्रम, क्रथ, दमन, रिपुमर्दन और क्रोधहंता पूर्व जन्म में दैत्यराज हिरण्यकशिपु के पोते थे। उन्होंने अपने पिता या कुल के विपरीत जाकर ब्रह्मा जी की कठिन तपस्या करके वरदान प्राप्त किया था। इस बात से क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने उन्हें श्राप दिया था कि वे अपने ही पिता के हाथों अगले जन्म में मारे जाएंगे।
कालनेमि का कंस के रूप में जन्म:-
वही कालनेमी नामक असुर पुनर्जन्म लेकर मथुरा का क्रूर राजा कंस बना, जो इन छहों भाइयों का पूर्व जन्म में पिता था। श्राप के प्रभाव और अपनी करनी के कारण वे छहों आत्माएं देवकी और वसुदेव के यहाँ ‘षद्गर्भ’ के रूप में जन्मीं। कंस को भविष्यवाणी से भय था कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा, इसलिए उसने देवकी के जन्म लेते ही इन छहों संतानों को एक-एक करके मार डाला।
देवकीजी के छ: पुत्रों को जन्म होते ही क्रूर कंस ने एक एक करके मार दिया।
सातवें भाई बलराम (संकर्षण) बच निकले :-
जब देवकी के छह पुत्रों का नाश हो जाता है, तब यह जानना चाहिए कि सातवाँ पुत्र अनंतदेव के रूप में प्रकट होता है, जो परमेश्वर के निवास, विश्राम स्थल और पलंग, छत्र आदि के रूप में प्रकट होते हैं।देवकी के गर्भ से सातवें बालक के रूप में भगवान बलराम का जन्म हुआ। योगमाया की प्रेरणा से इनका गर्भ देवकी के गर्भ से स्थानांतरित करके वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया था। इन्हें ‘संकर्षण’ और ‘बलभद्र’ भी कहा जाता है।
श्री कृष्ण आठवीं संतान थे –
जिस प्रकार प्रेम-भक्ति के प्रकट होने के बाद स्वयं परमेश्वर प्रकट होते हैं, उसी प्रकार श्री भगवान देवकी के आठवें पुत्र के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। यही देवकी के गर्भ में परमेश्वर के प्रकट होने का सार है।आठवीं संतान स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। स्वयं भगवान विष्णु ने देवकी के गर्भ से जन्म लिया और कंस का उद्धार किया था। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने पाताल लोक से उनकी आत्माओं को लाकर अपनी माता देवकी को उनके दर्शन भी कराए थे।
नोट: लेखक पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी रहे चुके हैं और वर्तमान में अपने गृह जनपद से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।


