रिपोर्ट: विजय नागपाल।
वृंदावन। सनातन धर्म और गौड़ीय वैष्णव परंपरा को विश्वभर में पहचान दिलाने वाले महान संत श्रील अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद का नाम आध्यात्मिक जगत में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र और सनातन संस्कृति का संदेश दुनिया के अनेक देशों तक पहुंचाया तथा विदेशों में इस्कॉन मंदिरों की स्थापना के माध्यम से लाखों लोगों को कृष्ण भक्ति से जोड़ा।
सितंबर 1896 में कोलकाता में जन्मे अभय चरण डे ने आगे चलकर संन्यास ग्रहण किया और श्रील प्रभुपाद के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने वृंदावन में रहकर श्रीमद्भागवत पुराण सहित वैदिक साहित्य का अंग्रेजी में अनुवाद और व्याख्या की, ताकि भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान को विश्व के लोगों तक पहुंचाया जा सके।
श्रील प्रभुपाद ने वर्ष 1966 में न्यूयॉर्क में इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शसनेस (इस्कॉन) की स्थापना की। इसके बाद उन्होंने कृष्ण भक्ति और ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र के प्रचार के लिए व्यापक विश्व भ्रमण किया। वर्ष 1966 से 1977 के बीच उन्होंने 14 बार विश्व भ्रमण किया। उनके प्रयासों से अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में इस्कॉन केंद्र और मंदिर स्थापित हुए।
इस्कॉन के माध्यम से उन्होंने विदेशों में सनातन संस्कृति, भारतीय दर्शन, भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत के संदेश को लोकप्रिय बनाया। उनके प्रयासों का प्रभाव इतना व्यापक रहा कि जिन देशों में भारतीय संस्कृति अपेक्षाकृत सीमित रूप से परिचित थी, वहां भी ‘हरे राम, हरे कृष्ण’ का महामंत्र गूंजने लगा।
श्रील प्रभुपाद के पौत्र शिष्य एवं इस्कॉन के वर्तमान आचार्य श्रील जयपताका स्वामी जी महाराज के शिष्य श्रीमान सुरपति दास ने बताया कि श्रील प्रभुपाद ने सबसे पहले न्यूयॉर्क में इस्कॉन मंदिर की स्थापना की। इसके बाद कैलिफोर्निया के सैन फ्रांसिस्को सहित अमेरिका के विभिन्न शहरों में इस्कॉन के केंद्र स्थापित हुए। आगे चलकर लंदन, हांगकांग, पेरिस, ऑस्ट्रेलिया सहित दुनिया के कई देशों में इस्कॉन मंदिरों की श्रृंखला विकसित हुई।
श्रील प्रभुपाद का जीवन सनातन धर्म, कृष्ण भक्ति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित रहा। उनके द्वारा शुरू किया गया हरे कृष्ण आंदोलन आज भी विश्व के अनेक देशों में सनातन संस्कृति और भक्ति परंपरा का संदेश पहुंचा रहा है।