रिपोर्ट: विजय नागपाल ।
मथुरा। गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के महान संत श्रील प्रभुपाद ने सनातन धर्म और श्रीकृष्ण भक्ति का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया। उनके प्रयासों से विदेशों में बड़ी संख्या में लोग सनातन संस्कृति और कृष्ण भक्ति से जुड़े। उन्होंने विश्वभर में भ्रमण कर ‘हरे कृष्णा’ अभियान को आगे बढ़ाया और अनेक देशों में इस्कान मंदिरों की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।


अभय चरण डे, जिन्हें अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद और श्रील प्रभुपाद के नाम से जाना जाता है, का जन्म सितंबर 1896 में कोलकाता में हुआ था। उन्होंने वर्ष 1959 में संन्यास ग्रहण किया। इसके बाद वे वृंदावन में रहे और श्रीमद्भागवत पुराण का अंग्रेजी में कई खंडों में अनुवाद किया।
श्रील प्रभुपाद ने वर्ष 1966 में न्यूयॉर्क में इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कान) की स्थापना की। वर्ष 1966 से 1977 के बीच उन्होंने 14 बार विश्व भ्रमण किया। इस दौरान उन्होंने कृष्ण भक्ति, भगवद्गीता और सनातन संस्कृति का संदेश विभिन्न देशों तक पहुंचाया। उनके प्रयासों से विदेशों में इस्कान केंद्रों और मंदिरों का विस्तार हुआ और ‘हरे कृष्ण, हरे राम’ का मंत्र अनेक देशों में गूंजने लगा।
इस्कान की प्रबंध समिति की सदस्य एवं सचिव रहीं अमेरिका निवासी देवी शक्ति माताजी ने अपने संस्मरण साझा करते हुए बताया कि वर्ष 1970 में अमेरिका में उनकी मुलाकात श्रील प्रभुपाद से हुई थी। उनके व्यक्तित्व, जीवनशैली और प्रवचनों से वे इतनी प्रभावित हुईं कि 18 वर्ष की आयु में ही उनसे दीक्षा ले ली। इसके बाद वे हरे कृष्ण आंदोलन से जुड़ गईं और श्रील प्रभुपाद के साथ प्रचार-प्रसार के कार्य में सहयोग करने लगीं।
देवी शक्ति माताजी के अनुसार, वर्ष 1974 में 22 वर्ष की आयु में वे अपने पति के साथ वृंदावन आईं। वर्ष 1975 में वृंदावन में इस्कान मंदिर की स्थापना के दौरान भी वे मौजूद रहीं। उन्होंने बताया कि न्यूयॉर्क में श्रील प्रभुपाद के अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ती गई और वहां इस्कान का पहला मंदिर स्थापित हुआ। इसके बाद कैलिफोर्निया और सैन फ्रांसिस्को सहित अमेरिका के अन्य शहरों में इस्कान केंद्रों का विस्तार हुआ।
धीरे-धीरे लंदन, हनोवर, पेरिस और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया के विभिन्न देशों में इस्कान मंदिरों और केंद्रों की शृंखला स्थापित होती गई। श्रील प्रभुपाद के प्रयासों से कृष्ण भक्ति का संदेश भारत की सीमाओं से निकलकर विश्वभर में पहुंचा और ‘हरे कृष्णा’ महामंत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने में सफल रहा।