सियासत और सनातन
आस्था को वर्ग और भूगोल की सीमाओं में बांटने की कोशिश?
विचार-मंथन | पं. धवल दीक्षित
मुरादाबाद। दिल्ली में आयोजित ‘द कॉन्क्लेव 2026’ के दौरान तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी के भगवान शिव को ‘गरीबों का देवता’ और भगवान राम को ‘अमीरों का देवता’ बताए जाने संबंधी कथित बयान ने धर्म, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में आस्था की अभिव्यक्ति को लेकर नई बहस छेड़ दी है। इस टिप्पणी में भाजपा पर भगवान राम को ‘चुराने’ का आरोप लगाए जाने तथा उत्तर-दक्षिण की धार्मिक मान्यताओं को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने की बात भी सामने आई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या भारतीय धार्मिक परंपराओं को राजनीतिक विमर्श में वर्ग और क्षेत्र के आधार पर परिभाषित किया जा सकता है?
भारतीय परंपरा में भगवान शिव और भगवान राम की आराधना किसी एक वर्ग, क्षेत्र या सामाजिक समूह तक सीमित नहीं रही है। देश के अलग-अलग हिस्सों में दोनों के प्रति आस्था की विविध परंपराएं दिखाई देती हैं। इसी संदर्भ में प्रचलित धार्मिक उक्ति—‘शिवस्य हृदयं विष्णुः, विष्णुश्च हृदयं शिवः’—देव परंपराओं के बीच एकात्म भाव को रेखांकित करती है।
सार्वजनिक जीवन में आस्था की अभिव्यक्ति
भारतीय राजनीति में सार्वजनिक मंचों पर धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रतीकों की अभिव्यक्ति भी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक संबोधनों और विभिन्न धार्मिक-सांस्कृतिक अवसरों पर ‘हर हर महादेव’ तथा ‘जय श्री राम’ जैसे उद्घोषों का प्रयोग इसका एक प्रमुख उदाहरण है। काशी, अयोध्या, केदारनाथ, बद्रीनाथ और सोमनाथ जैसे धार्मिक स्थलों से जुड़े कार्यक्रमों में भी उनकी धार्मिक-सांस्कृतिक अभिव्यक्ति सार्वजनिक रूप से दिखाई देती रही है।
दूसरी ओर, कांग्रेस नेता राहुल गांधी की धार्मिक अभिव्यक्ति को लेकर भी राजनीतिक बहस होती रही है। वे विभिन्न अवसरों पर मंदिरों में दर्शन करते रहे हैं और उज्जैन के महाकालेश्वर तथा बाबा वैद्यनाथ जैसे धार्मिक स्थलों की यात्राएं भी कर चुके हैं। हालांकि उनके राजनीतिक विरोधी उनकी धार्मिक अभिव्यक्ति के तरीके को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। वहीं कांग्रेस और उसके समर्थक इसे व्यक्तिगत आस्था तथा धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दृष्टिकोण के संदर्भ में देखते हैं।
आस्था बनाम राजनीतिक विमर्श
पं. धवल दीक्षित का कहना है कि भगवान शिव और भगवान राम को अमीर-गरीब अथवा उत्तर-दक्षिण के आधार पर अलग-अलग खांचे में रखना भारतीय धार्मिक परंपरा की व्यापकता को सीमित करने जैसा है। उनके अनुसार भारतीय समाज में आस्था सामाजिक और आर्थिक वर्गों की सीमाओं से कहीं अधिक व्यापक रही है।
हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि धर्म और राजनीति का संबंध भारतीय लोकतंत्र में लगातार बहस का विषय रहा है। राजनीतिक दल और नेता धार्मिक प्रतीकों तथा सांस्कृतिक परंपराओं को अलग-अलग तरीकों से प्रस्तुत करते हैं। समर्थक इसे सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति मानते हैं, जबकि आलोचक इसे राजनीतिक संचार और चुनावी राजनीति के संदर्भ में देखते हैं।
उत्तर से दक्षिण तक साझा आस्था
भारतीय धार्मिक परंपराओं का भूगोल भी किसी एक दिशा तक सीमित नहीं है। उत्तर में काशी और केदारनाथ जैसे शिवधाम हैं तो दक्षिण में रामेश्वरम और भद्राचलम जैसे प्रमुख धार्मिक केंद्र हैं। इसी प्रकार देश के विभिन्न हिस्सों में राम और शिव दोनों की आराधना की अलग-अलग परंपराएं मिलती हैं।
इसलिए असली प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि शिव किस वर्ग के देवता हैं या राम किस क्षेत्र के, बल्कि यह होना चाहिए कि राजनीतिक विमर्श में धार्मिक आस्था को किस प्रकार प्रस्तुत किया जाए। भारत की सांस्कृतिक परंपरा की विशेषता ही इसकी विविधता और सह-अस्तित्व में रही है।
राजनीति में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है, लेकिन जब धार्मिक आस्था को वर्ग, क्षेत्र या राजनीतिक पहचान के आधार पर परिभाषित करने की कोशिश होती है, तो बहस केवल राजनीतिक नहीं रहती, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। यही वह बिंदु है जहां भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेदों के साथ-साथ आस्था की विविधता और नागरिकों की व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता पर भी गंभीर विचार आवश्यक हो जाता है।


