प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ अनैतिक व्यापार निवारण (ITP) अधिनियम के तहत दर्ज मुकदमे को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज ग्राहक के रूप में वेश्यालय जाने वाले व्यक्ति पर ITP अधिनियम की धाराएं 3, 4, 5 और 7 लागू नहीं की जा सकतीं।
जस्टिस गौतम चौधरी ने 11 अगस्त को नितिन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि केवल अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए किसी महिला को पैसे देना, अपने आप में वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किसी व्यक्ति की खरीद-फरोख्त या वेश्यालय के संचालन में भागीदारी नहीं माना जा सकता।
धाराएं किस तरह के अपराध से संबंधित हैं?
कोर्ट ने कहा कि ITP अधिनियम की संबंधित धाराएं मुख्य रूप से वेश्यालय चलाने या उसका प्रबंधन करने, किसी स्थान को वेश्यालय के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति देने, किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति से होने वाली कमाई पर जीवन-यापन करने तथा किसी व्यक्ति को यौन शोषण के लिए उपलब्ध कराने, उकसाने या ले जाने जैसे कृत्यों से संबंधित हैं।
कोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति का केवल ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाना इन गतिविधियों के बराबर नहीं है।
ग्राहक और वेश्यालय संचालक में अंतर
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति ग्राहक के तौर पर वेश्यालय जाता है, तो अधिकतम यह कहा जा सकता है कि वह अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए वहां किसी महिला की सेवा ले रहा है। इसे ITP अधिनियम में परिभाषित वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किया गया कृत्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि कानून में व्यावसायिक शोषण एक महत्वपूर्ण तत्व है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल धन देकर यौन सेवा लेने से किसी ग्राहक को वेश्यालय चलाने, उसका प्रबंधन करने या उसके संचालन में सहयोग करने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता।
नितिन को कोर्ट ने माना महज ग्राहक
नितिन की याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की भूमिका केवल एक ग्राहक की थी। वह पैसे देकर अपनी कामेच्छा की संतुष्टि के लिए वहां गया था, न कि किसी अन्य व्यक्ति से वेश्यावृत्ति कराने या उसका शोषण करने के उद्देश्य से।
इसी आधार पर हाई कोर्ट ने माना कि ITP अधिनियम की धारा 3, 4, 5 और 7 उसके खिलाफ लागू नहीं होतीं। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग होगा।