ई-सिम के सहारे विदेश से चल रहा था ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खेल, लखनऊ साइबर पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय ठगी नेटवर्क का किया भंडाफोड़।

Vijaydoot News

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पुलिस के विशेष अभियान ऑपरेशन “CYVAJRA” के तहत लखनऊ साइबर क्राइम थाना पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करते हुए दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि भारतीय नागरिकों के पहचान दस्तावेजों और ई-केवाईसी का दुरुपयोग कर फर्जी ई-सिम तैयार किए जाते थे, जिन्हें कंबोडिया सहित विदेशों में सक्रिय साइबर अपराधियों को बेचा जाता था। इन ई-सिम के माध्यम से डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी, ओटीपी फ्रॉड, ट्रेडिंग फ्रॉड और अन्य साइबर अपराधों को अंजाम दिया जा रहा था। मामले में पुलिस ने 70 लाख रुपये की साइबर ठगी का खुलासा करते हुए 35 लाख रुपये फ्रीज करा दिए हैं।

पुलिस आयुक्त तरुण गाबा के निर्देशन, संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध एवं मुख्यालय) अपर्णा कुमार के पर्यवेक्षण, पुलिस उपायुक्त (अपराध) अनिल कुमार यादव के मार्गदर्शन तथा अपर पुलिस उपायुक्त (अपराध) किरन यादव के नेतृत्व में साइबर क्राइम थाना पुलिस ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया।

पुलिस के अनुसार पीड़ित को फोन कर खुद को एटीएस पुणे का अधिकारी बताया गया और मनी लॉन्ड्रिंग सहित गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी देकर 16 जुलाई से 22 जुलाई तक लगातार वीडियो कॉल के माध्यम से मानसिक दबाव बनाया गया। तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” में रखकर पीड़ित को अपनी बैंक जमा राशि और एफडी विभिन्न खातों में स्थानांतरित करने के लिए मजबूर किया गया। भय और दबाव में आकर पीड़ित ने कुल 70 लाख रुपये चार अलग-अलग बैंक खातों में भेज दिए। शिकायत मिलने के बाद साइबर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए तीन बैंक खातों में जमा 35 लाख रुपये फ्रीज करा दिए।

विवेचना के दौरान तकनीकी विश्लेषण और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर जिस मोबाइल नंबर से पहली कॉल की गई थी, उसकी जांच की गई। पता चला कि संबंधित सिम लखनऊ के एक अधिकृत पॉइंट ऑफ सेल से जारी किया गया था। जब सिम धारक का सत्यापन किया गया तो वह बेहद सामान्य और गरीब व्यक्ति निकला, जिसे यह तक जानकारी नहीं थी कि उसके नाम पर जारी सिम का उपयोग अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध में किया जा रहा है।

जांच आगे बढ़ी तो सामने आया कि गिरफ्तार आरोपी सुमित कुमार रावत अधिकृत जियो सिम विक्रेता था। उसका संपर्क एयरटेल सेवा प्रदाता ईशु यादव से था, जिसने उसे बड़ी संख्या में ब्लैंक एयरटेल सिम उपलब्ध कराए थे। सुमित नया जियो सिम लेने या मोबाइल नंबर पोर्ट कराने आने वाले ग्राहकों से तकनीकी समस्या का बहाना बनाकर दो बार ई-केवाईसी कराता था। एक सिम ग्राहक को दे दिया जाता था, जबकि उसी ग्राहक के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर दूसरा एयरटेल सिम गुप्त रूप से सक्रिय कर लिया जाता था। बाद में इन सिम को ई-सिम में बदलने के लिए एक्टिवेशन क्यूआर कोड तैयार किए जाते थे।

पुलिस के अनुसार सुमित प्रत्येक सक्रिय ई-सिम 325 रुपये में मुख्य सरगना प्रवीण श्रीवास्तव उर्फ अमित को बेचता था। प्रवीण इन ई-सिम को टेलीग्राम के माध्यम से विदेशी साइबर अपराधियों को लगभग 50 यूएसडीटी प्रति ई-सिम की दर से उपलब्ध कराता था और भुगतान क्रिप्टोकरेंसी के जरिए प्राप्त करता था। जांच में उसके क्रिप्टो वॉलेट से 144 यूएसडीटी भी बरामद हुए हैं।

विवेचना में यह भी सामने आया कि भारतीय मोबाइल नंबरों का उपयोग कंबोडिया में बैठे साइबर अपराधी भारत में सक्रिय होने का आभास देने के लिए करते थे, जिससे वे कानून प्रवर्तन एजेंसियों और दूरसंचार सत्यापन प्रणाली को भ्रमित कर डिजिटल अरेस्ट, निवेश धोखाधड़ी, ट्रेडिंग फ्रॉड, ओटीपी फ्रॉड और अन्य साइबर अपराधों को अंजाम देते थे।

साइबर पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से तीन मोबाइल फोन, 105 सिम कार्ड, पांच खुले सिम पैकेट, विभिन्न मोबाइल नंबरों और ई-सिम से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड, टेलीग्राम चैट, क्रिप्टो वॉलेट तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य बरामद किए हैं। गिरफ्तार आरोपियों में प्रवीण श्रीवास्तव उर्फ अमित, जिसे गिरोह का मुख्य सरगना बताया गया है, तथा सुमित कुमार रावत, जो सिम विक्रेता के रूप में कार्यरत था, शामिल हैं। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य आरोपियों, विदेशी संपर्कों और वित्तीय लेन-देन की जांच कर रही है।

साइबर पुलिस ने नागरिकों को आगाह किया है कि भारत में “डिजिटल अरेस्ट” जैसी कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है। यदि कोई व्यक्ति स्वयं को पुलिस, सीबीआई, ईडी, एटीएस या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर वीडियो कॉल पर धमकाए या धनराशि स्थानांतरित करने का दबाव बनाए तो उसकी बातों पर विश्वास न करें। किसी भी साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में तत्काल साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराएं तथा नया सिम लेते समय अपने केवाईसी और ओटीपी की सुरक्षा स्वयं सुनिश्चित करें।