•भारत छोड़ो आंदोलन में निभाई अहम भूमिका, जेल में सहीं यातनाएं और देशसेवा में लगा दी अपनी संपत्ति.
मुरादाबाद। भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाने वाले वीर सेनानियों की गाथा आज भी देशवासियों में राष्ट्रभक्ति का संचार करती है। मुरादाबाद मंडल के अनेक क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी। इन्हीं महान स्वतंत्रता सेनानियों में राम अवतार दीक्षित का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। उनका जीवन त्याग, संघर्ष, देशभक्ति और सादगी की मिसाल रहा।

राम अवतार दीक्षित के पिता बूलचंद दीक्षित स्वयं प्रखर क्रांतिकारी थे। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के चलते अंग्रेजी शासन ने उनके माता-पिता को लाहौर की जेल में बंद कर दिया था। इसी दौरान वर्ष 1923 में राम अवतार दीक्षित का जन्म लाहौर जेल में हुआ। बाद में उनका पालन-पोषण जैतरा, धामपुर में हुआ।
पिता से मिले देशभक्ति के संस्कारों ने राम अवतार दीक्षित के भीतर बचपन से ही राष्ट्रसेवा की भावना पैदा कर दी। युवावस्था में पहुंचते ही उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी शुरू कर दी। उन्होंने धामपुर के डाकघर में अंग्रेजी शासन के प्रतीकों को निशाना बनाया, डाकघर में तोड़फोड़ की और आग लगा दी। इसके बाद थाने पर फहराए जा रहे अंग्रेजी झंडे को उतारकर भारतीय तिरंगा फहराया। डाकघर से प्राप्त सरकारी धन को भी उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े क्रांतिकारियों की सहायता में लगा दिया।
राम अवतार दीक्षित ने मुरादाबाद, बिजनौर और अमरोहा सहित विभिन्न क्षेत्रों में गुप्त सभाएं आयोजित कर भारत छोड़ो आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। देश की आजादी के लिए उन्होंने अपनी जमीन तक बेच दी और उससे प्राप्त धनराशि स्वतंत्रता आंदोलन तथा क्रांतिकारियों की सहायता में लगा दी। इस संघर्ष में उन्हें विशंभर नाथ, राम गुलाम, शिवस्वरूप, शंभू दयाल सिंह और दाऊ दयाल खन्ना जैसे स्वतंत्रता सेनानियों का सहयोग मिला।
जेल में सहीं अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं
वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान राम अवतार दीक्षित को उनके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी सरकार ने उन्हें दो वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई। जेल में उन्होंने कैदियों के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार का विरोध किया। इसके चलते उन्हें अतिरिक्त सजा के रूप में कोड़ों की मार झेलनी पड़ी और ‘टाट वर्दी’ जैसी कठोर यातनाएं भी सहनी पड़ीं।
उनके जेल में रहने के दौरान अंग्रेजी शासन के भय से दुकानदार उनके परिवार को राशन देने से भी कतराते थे। उनकी माता को कई-कई दिनों तक भूखा रहना पड़ा, लेकिन उन्होंने पति और पुत्र के देशप्रेम पर कभी गर्व करना नहीं छोड़ा। परिवार ने आर्थिक तंगी के साथ घर की अघोषित कुर्की जैसी कठिन परिस्थितियों का भी सामना किया।
आजादी के बाद भी जारी रहा संघर्ष
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राम अवतार दीक्षित का विवाह माया देवी से हुआ। देशसेवा के कारण परिवार को लंबे समय तक आर्थिक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा। जीवनयापन के लिए उन्होंने मजदूरी और चौकीदारी तक की। बाद में उन्हें सरकारी सेवा का अवसर मिला।
उनकी पत्नी माया देवी ने भी संघर्षों के बीच उच्च शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने डबल एमए और बीएड की शिक्षा हासिल की तथा बाद में राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में शिक्षिका के रूप में सेवाएं दीं। राम अवतार दीक्षित का मानना था कि देश निर्माण में शिक्षा और राष्ट्रभक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका है।
ताम्रपत्र से हुए सम्मानित
देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राम अवतार दीक्षित को ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया। केंद्र एवं राज्य सरकार की ओर से उन्हें स्वतंत्रता सेनानी सम्मान पेंशन भी प्रदान की गई। विशेष बात यह रही कि उन्होंने अपनी पेंशन का एक हिस्सा जीवनभर स्वतंत्रता सेनानी भवन के लिए दान किया।
राम अवतार दीक्षित बेहद सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वह अपने कपड़े स्वयं धोते और उन्हें तकिए के नीचे रखकर प्रेस करते थे। पत्नी के कपड़े धोने की बात कहने पर वह मुस्कुराते हुए कहते थे कि तुम शिक्षिका हो और तुम्हारा काम बच्चों में देशप्रेम तथा राष्ट्र निर्माण के संस्कार जगाना है।
अगली पीढ़ी भी बढ़ा रही विरासत
राम अवतार दीक्षित और माया देवी की छह संतानें हैं, जिनमें चार पुत्र और दो पुत्रियां हैं। परिवार आज भी उनके आदर्शों को आगे बढ़ा रहा है। उनके पुत्र धवल दीक्षित अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी एवं उत्तराधिकारी संगठन के महामंत्री हैं और स्वतंत्रता सेनानियों तथा उनके परिवारों के सम्मान के लिए लगातार कार्य कर रहे हैं।
धवल दीक्षित ने मुरादाबाद स्थित कंपनी बाग के स्वतंत्रता सेनानी भवन के जीर्णोद्धार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वह स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को सम्मानित करने तथा देश के महान क्रांतिकारियों की स्मृतियों को जीवंत रखने के लिए प्रयासरत हैं। उनके प्रयासों से सेनानी भवन परिसर में भारत माता की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
23 दिसंबर 2006 को हुआ निधन
स्वतंत्रता के बाद भी राम अवतार दीक्षित स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिवारों की उपेक्षित स्थिति को लेकर चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि स्वतंत्रता सेनानियों और उनके परिजनों का सम्मान एवं सहयोग समाज और सरकार का दायित्व है।
23 दिसंबर 2006 को मुरादाबाद में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके संघर्ष और राष्ट्रभक्ति की कहानी आज भी लोगों को प्रेरित करती है। आजादी के लिए अपना जीवन, संपत्ति और सुख-सुविधाएं न्योछावर करने वाले अमर क्रांतिकारी राम अवतार दीक्षित को शत-शत नमन।