•पाचनतंत्र को विश्राम, मेटाबोलिज्म सुधार एवं हार्मोनल होता है नियंत्रित।
मुरादाबाद। सुविख्यात साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कि भारतीय सनातन संस्कृति में त्यौहार हमारी म्युनिसिपैलिटी हैं। शिक्षाविद एवं पर्यावरण मित्र पं.राधेश्याम शर्मा ने बताया कि श्रावण मास की त्रयोदशी (प्रदोष व्रत) के दिन उपवास और शिव आराधना करने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है, और वर्षा ऋतु में होने वाले संक्रमण से बचाव होता है। यह चंद्रमा के क्षीण होने के चक्र से जुड़ी तिथि है जो मानसिक संतुलन को नियंत्रित करने में मदद करती है। वर्षा ऋतु में शरीर की चयापचय मेटाबोलिज्म दर कम हो जाती है, जिससे त्रयोदशी का उपवास पाचन अंगों को आराम देता है।
सावन के गीले मौसम में फलाहार और हल्का भोजन करने से आंतरिक ऊर्जा संचित होती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र चढ़ाने की परंपरा मन को शांत करने के साथ पर्यावरण और शरीर के तापमान में संतुलन बनाए रखती है। वर्षा के दौरान वातावरण में उच्च आर्द्रता होती है, जिसे संयमित आहार और ध्यान से नियंत्रित किया जा सकता है । त्रयोदशी तिथि का संबंध चंद्रमा के घटते-बढ़ते क्रम से है, जो मानव मन की स्थिरता और हॉर्मोनल संतुलन पर सकारात्मक प्रभाव डालता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रावण मास की त्रयोदशी तिथि भगवान शिव की कृपा पाने के लिए अत्यंत पवित्र और फलदायी मानी जाती है। इस दिन प्रदोष काल में शिव पूजा करने से सारे पाप नष्ट होते हैं, मानसिक शांति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यदि यह त्रयोदशी सोमवार के दिन पड़े, तो इसे ‘सोम प्रदोष’ कहते हैं, जिससे इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
श्रावण मास महादेव को सबसे अधिक प्रिय है, इसलिए इस दौरान की जाने वाली त्रयोदशी का पुण्य सामान्य दिनों से अधिक होता है। सूर्यास्त के ठीक बाद का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस समय शिव जी कैलाश पर प्रसन्न मुद्रा में नृत्य करते हैं और भक्तों की पुकार सुनते हैं।
इस व्रत को करने से कुंडली के चंद्र दोष, ग्रह बाधा और जीवन के अन्य कष्ट दूर होते हैं। मन का भटकाव और तनाव कम होता है। घर में धन, धान्य और पारिवारिक सुख का आगमन होता है। उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु का आशीर्वाद मिलता है। प्रदोष काल में गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से शिवलिंग का अभिषेक करें।शिव जी को बेलपत्र, धतूरा, भांग और सफेद फूल अर्पित करें। पूजा के दौरान ॐ नमः शिवाय मंत्र का 108 बार जाप करें।